Tuesday, March 3, 2009

जीवंत है बीकानेरी पाटा


मुझे खुशी है कि बीकानेर पधारने के मेरे न्‍यौते को आप लोगों ने स्‍वीकार किया। पिछली पोस्‍ट के बाद अधिकांश लोगों ने बीकानेरी पाटों के बारे में जानने की उत्‍सुकता रखी। यह मेरे लिए और भी रोमांचक है। पाटों से पहले मैं आपको बीकानेर शहर से परिचय कराना चाहूंगा। बीकाजी ने इस शहर की स्‍थापना की। शहर पूरी तरह से एक सफील (यानि शहर के चारों तरफ एक दीवार है ) है। आज तो शहर विस्‍तृत हो गया लेकिन कुछ दशकों पहले तक शहर के चारों तरफ लगे दरवाजे बंद हो जाते थे। रात बारह बजे बाद न तो कोई शहर से बाहर निकल सकता था और न ही कोई शहर में प्रवेश कर सकता था। जस्‍सूसर गेट, नत्‍थूसर गेट, गोगागेट, शीतला गेट और कोटगेट को बन्‍द कर दिया जाता। रात के समय शहर पूरी तरह एक घर की तरह बन्‍द हो जाता। ठीक वैसे ही यहां के बाशिन्‍दे आराम की नींद सोते जैसे आप अपने घर का दरवाजा बन्‍द करके सोते हैं। शहर के अंदर बने घरों के दरवाजे खुले रहते क्‍योंकि शहर बाहर से पूरी तरह बन्‍द है। रात में लोग ठीक वैसे चौक में बैठ जाते जैसे आप नींद नहीं आने पर घर की लॉबी में बैठ जाते हैं। 1980 से पहले बीकानेर में दूरदर्शन का दर्शन नहीं था इसलिए सिर्फ पाटे ही एकमात्र वक्‍त काटने का स्‍थान था। हर चौक में एक पाटा रख दिया गया, इस पर दिन में बुजुर्ग बैठते तो शाम को किशोर शतरंज की चाल चलाते हैं और रात को युवा और अधेड एक साथ बैठकर चर्चा करते हैं। सर्दी हो या गर्मी बीकानेर के पाटे कभी सूने नहीं रहते। पाटों पर शहर हर वक्‍त जागता रहता है। पाटा है कि कभी सोता नहीं, उसकी गोद में कोई न कोई बैठा ही रहता है। ऐसे चौक भी हैं, जहां रातभर रौनक रहती है। अब चुनाव का मौका है तो आप बीकानेर के किसी भी पाटे पर पहुंचकर देश की हर सीट के बारे में चर्चा कर सकते हैं। यहां के लोगों सामान्‍य ज्ञान इतना बेहतर है कि दक्षिण की एक एक सीट के बारे में भी इन पाटों पर चर्चा सुन सकते हैं। अगर आप भटटडों के चौक में स्थित पाटे पर शाम को पहुंचे तो सच मानिए सुबह तक वहां से उठ नहीं सकेंगे। आपको आश्‍चर्य होगा कि पाटे के चारों और बसे लोग यहां आकर बैठ जाते हैं। घर वाले खाने के लिए आवाजें लगाते लगाते थक जाते हैं तो पाटे पर ही थाली पहुंचा देते हैं। खाना किस घर से आया है किसी को इससे सरोकार नहीं है, भूख है तो उठाया और खा लिखा। ऐसा भी होता है कि आवाज लगातार रात को दो बजे घर की महिलाओं से खाना मंगवा लिया जाता है। मोहतों के चौक में स्थित पाटे पर भी आपको रातभर रौनक मिलेगी। हर्षों के चौक में स्थित पाटे पर तो आपको शतरंज की चाल चलने का अवसर भी मिल सकता है। यहां शाम से देर रात तक शतरंज की इतनी चाले चलती है कि खुद लकडी का वजीर भी बोल देता है 'भाई बस करो, थक गया हूं।' हर चौक में लकडी का बना पाटा ही लगा है। इन पाटों की उम्र कम से कम सौ वर्ष है। कुछ ऐसे चौक भी है, जहां हाल ही में पाटे लगे हैं। अब फैल चुके शहर के लोग दूर कॉलोनियों में भी रहने लगे हैं लेकिन रात को एक बार पाटे पर आए बिना उनको नींद नहीं आती। इन्‍हीं पाटों पर जीवन के संघर्ष की कहानी है तो इन्‍हीं पाटों पर दुख दर्द भी बंट जाता है, इन्‍हीं पाटों पर बैठकर स्‍कूल के लिए बस का इंतजार होता है, इन्‍हीं पाटों पर कॉलेज जाने के लिए साथी का इंतजार होता है, इन्‍हीं पाटों पर ऑफिस जाने से पहले ब्रिफकेस रखी जाती है तो इन्‍हीं पाटों पर लाडो और लाडी की सगाई तय हो जाती है, इसी पाटे पर पाते और दोहिते होने की मिठाई बंटती है। पाटा जीवन से पहले और जीवन के बाद तक साथ देता है। मृत्‍यु के बाद इन्‍हीं पाटों पर 'बैठक' भी होती है। इन्‍हीं पाटों पर अगली पीढी अपने जीवन का सफर तय करती है। सच मानिए इस पाटे पर जीवन है। सच मानिए अगर आप रुचि लेंगे तो पाटो से जुडे कई रोचक तथ्‍य भी आगे बताऊंगा। 

7 comments:

RAJIV MAHESHWARI said...

और बताओ न यार .....क्यों सस्पेन्स बना रहे हो.
अगली बार अलग -अलग चौक का चित्र भी ब्लॉग में लगाना . अच्छा लगेगा,बीकानेर को और जाने का मोका मिलेगा.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत सुना है इन पाटों के बारे में।

Udan Tashtari said...

पाटों के बारे में जानकारी के लिए आभार.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक लगी यह जानकारी ..अगली कड़ी का इन्तजार

PN Subramanian said...

हमारी तो बड़ी इक्षा हो रही है कि हम बीकानेर की इस पुराने बस्ती में बस ही जाएँ. आभार.

नीरज गोस्वामी said...

बीकानेर बहुत ही सुन्दर शहर है...पर्यटकों के लिए स्वर्ग...काश आप यहाँ की और भी फोटो दिखाते...
नीरज

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

पाटों पर जानकारी एक यह अलहदा अंदाज लोगों को लुभाएगा। ब्‍लॉग पर इसके बारे में लिखना अपने ही शहर को नए दृष्टिकोण से देखने जैसा है।