Saturday, January 31, 2009

मीडिया पर छींटाकशी क्‍यों ?

पिछले कुछ दिनों से ब्‍लॉग पर देख रहा हूं कि मीडिया पर जमकर छींटाकशी हो रही है। जिसके जो मन में आया उसी ने मीडिया को बीच में लिया और दो तीन बातें बोलकर अपना गला साफ कर लिया या फिर की बोर्ड पर धना धन जोर मारकर गुस्‍सा उतार लिया। हर मुद़दे के अंत में मीडिया को दोषी बताकर हर कोई किनारा कर लेता है। आश्‍चर्य की बात है कि जो जनता मीडिया को मुद़दा उठाने के लिए प्रेरित करती है, वह भी अंत में मीडिया पर अपना ही गुस्‍सा उतारती है। अपनी बात रखना अनुचित  तो नहीं है लेकिन आंख बंद करके एक पक्ष की बात करना शायद ठीक नहीं। बात भारत पाकिस्‍तान के बीच  तनाव की हो या फिर किसी दूसरे मामले की। अंत में नेता, अधिकारी और अब जनता तक यह बोलकर सारे मामले पर पानी फेर देते हैं कि यह सब मीडिया का करा धरा है। जब से मुम्‍बई में हमला हुआ है तब से आखिर किस नेता ने अनवरत पाकिस्‍तान के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है, आखिर किस पार्टी ने पाकिस्‍तान के खिलाफ युद्व को अपना चुनावी घोषणा पत्र का हिस्‍सा बताया है, किस व्‍यक्ति ने पाकिस्‍तान पर युद्व नहीं होने तक अनशन की चेतावनी दी है, किस अधिकारी ने आतंकवाद को खत्‍म करने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने की तैयारी कर ली है। मैं मानता हूं कि अगर आतंकवाद से कोई लड रहा तो पहला सेना का जवान,  दूसरा पुलिस का जांबाज और तीसरा मीडिया। आम आदमी इस पीडा को सहन कर रहा है लेकिन बोलने के लिए तैयार नहीं है। सेना पर खडा जवान हर वक्‍त जान हथेली पर लेकर घुसपैठ रोकने की कवायद में जुटा है, हेमंत करकरे जैसे पुलिस के जाबांज जान तक दे देते हैं और बाद में लोग इसे शहादत तक मानने को तैयार नहीं होते। मुम्‍बई हमले के बाद से अब तक देशभर में हजारों कार्यक्रम हो गए, श्रद्वांजलि सभाएं हो गई, लाखों लोगों ने इसमें हिस्‍सा लिया लेकिन क्‍या किसी ने अपने बेटे को सेना में भर्ती करने का मानस बनाया, क्‍या किसी ने अपनी आंखों के तारे को देश रक्षा के लिए समर्पित करने का दायित्‍व निभाया। देखने में आया है कि लोग जब भी मौका पडता है अपना गला साफ करने के लिए कुछ भी बोल देते हैं। कुछ ऐसे ही कोपभाजन का शिकार बेचारा मीडिया भी होता है। मेरी नजर में मीडिया की स्थिति उस धोबी जैसी हो गई है जो गधे पर चढे तो भी बुरा कहा जाए और उतर जाए तो मूर्ख माना जाए। मुम्‍बई हमले के बाद से अब तक लगातार कुछ टीवी चैनल पाकिस्‍तान के खिलाफ सबूत प्रस्‍तुत कर रहे हैं, अनेक समाचार पत्र इस मामले को प्रथम पृष्‍ठ पर प्रकाशित कर रहे हैं। अपने मैगजीन में इस मामले को काफी शिद़दत के साथ उठा रहे हैं। इसके बाद भी कुछ लोगों ने यहां तक बोल दिया कि भारत पाक संबंधों में मीडिया की भूमिका ठीक नहीं है। पाकिस्‍तान की एक महिला पत्रकार ने तो यहां तक लिख दिया कि भारत के अपरिपक्‍व पत्रकार संबंधों को खराब करने में लगे हैं। क्‍या पाकिस्‍तान से  प्रसारित हो रहे सभी समाचारों में भारत को 'माता' बोलकर संबोधित किया जा रहा है। क्‍या कसाब के बारे में एक'एक हकीकत बनाना अपरिपक्‍वता है, क्‍या पाकिस्‍तान को सुबूत गिनाना अपरिपक्‍वता है, क्‍या पाकिस्‍तान में आतंककारी संगठनों की बढती शक्ति को दुनिया के सामने रखना अपरिपक्‍वता है। दुख इस बात है कि देश के नेता भी यह कहने से नहीं चूकते कि युद्व तो मीडिया में हो रहा है। जमीन पर ऐसा कुछ नहीं है। शर्म आती है ऐसे नेताओं की जो पाकिस्‍तान को जबानी कुछ कहने में भी संकोच करते हैं, शर्म आती है ऐसे नेताओं कि जो भारत की तरफ गुर्रा रहे लोगों के मुंह पर हाथ रखने की जुर्रत कर रहे हैं। आखिर क्‍यों हम पाकिस्‍तान के खिलाफ बोलने में ही संकोच कर रहे हैं। देश के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री या फिर रक्षा मंत्री थोडा सा बोलकर ही अपना गुस्‍सा दिखाते हैं तो मीडिया उसे शानदार तरीके से उठाता है ताकि द‍ुनिया को लगे कि भारत अब आतंक सहन करने वाला नहीं है। हां कुछ मीडियाकर्मी अपने दायित्‍व को भूलकर किसी मुद़दे को ज्‍यादा बढावा दे रहे होंगे, लेकिन पाकिस्‍तान के खिलाफ बोल रहे मीडिया पर किसी की विपरीत टिप्‍पणी मेरी नजर में उचित नहीं है। कम से कम जो बोल रहा है उसे तो बोलने दें। ब्‍लॉग की दुनिया तो और भी शानदार काम किया कि अब प्रिंट और इलेक्‍टानिक मीडिया को ही आमने सामने कर दिया। अरे भई आपके ब्‍लॉग पर वैसे ही खूब हिट हो जाएगी। इन भाईयों को लडाने का काम तो मत करो।

Wednesday, January 28, 2009

पुरस्‍कार ले लो, पुरस्‍कार

घर की छत्‍त पर गुनगुनी धूप का आनन्‍द ले रहा था कि नीचे से आवाज सुनाई दी 'पुरस्‍कार ले लो, पुरस्‍कार ' मैं चकित था, नीचे देखा तो एक गाडे वाला अपने गाडे में पुरस्‍कार लिए घूम रहा था और पुरस्‍कार बेच रहा था। मैं दौडता हुआ नीचे उतरा तो उससे पूछा 'भई क्‍या बेच रहे हो' उसने कहा ''कान खराब हो गए ? क्‍या सुनकर दौडकर आए हो। पुरस्‍कार बेच रहा हूं, लेना है तो बोलो नहीं अगली गली चलो।' मैंने कहा 'तुम पुरस्‍कार बेच कैसे सकते हो, यह तो सम्‍मान है और सम्‍मान तो दिया जाता है खरीदा थोडे जाता है।' उसने कहा ''नींद अगर खुली नहीं है तो पानी मुंह पर छिडक लो भाई जान'' यह वर्ष 2009 है पुरस्‍कार तो 2000 से पहले ही बिकने शुरू हो गए थे।'' आपको जैसा पुरस्‍कार चाहिए यहां हाजिर है। बस राष्‍टीय स्‍तर की मांग मत करना क्‍योंकि वो मेरे गाडे पर आ नहीं सकते। जिला स्‍तर पर हो या फिर राज्‍य स्‍तर पर पुरस्‍कार अपने पास उपलब्‍ध है। सर्टिफिकेट भी है अच्‍छे हाथ से नाम लिखवा लेना।'' मैं अभी कुछ समझ पाता इससे पहले उसने कहा ''आपको कुछ लेना तो है नहीं आप तो बस आवेदन करते जाओ, कभी कोई नहीं पहुंचा तो पुरस्‍कार आपको मिल जाएगा। ऐसा दिन आएगा नहीं और पुरस्‍कार खरीदने की तुम्‍हारी हैसियत नहीं।'' इतना कहते हुए वो आगे निकल गया और मैं एकटक उसे देखता रह गया। अचानक मुंह पर कुछ गिरने की आवाज आई, वो तकिया था और सामने पत्‍नी चाय हाथ में लिए गुर्रा रही थी, बोली ''चाय ठण्‍डी हो रही है, और फिर पुरस्‍कार पुरस्‍कार क्‍यों बडबडा रहे थे, अब तो 26 जनवरी भी निकल गई। तुम्‍हे कुछ नहीं मिला, तुम्‍हारे से अच्‍छा तो सामने वाले सरकारी कार्यालय का चपरासी है जो दिनभर पान की दुकान पर पीक थूकते थूकते पुरस्‍कार ले आया।'' मैं सोचने को मजबूर था। वो चपरासी पिछले कुछ दिन से साब के यहां चक्‍कर काट रहा था, माजरा क्‍या है अब समझ आ रहा था। उसे पुरस्‍कार मिल गया यानि वो ज्‍यादा काम करने वाला साबित हो गया। जिन्‍हें नहीं मिला, वो निठल्‍ले हैं कुछ ऐसा भी साबित हो गया। अखबार उठाकर देखा तो हर विभाग की एक सूची थी, जिनको मैं निठल्‍ला श्री के रूप में जानता था, उन सब के नाम छप रहे थे। कुछ तो ऐसे भी थे, जिनकी उम्र साठ के पास थी और पुरस्‍कार नवोदित की श्रेणी में ले रहे थे। पुरस्‍कार देने वाले अतिथि भी हंस रहे थे लेकिन मजबूर थे कि पुरस्‍कार तो देना ही है, चयन भले ही कैसा ही हुआ हो। साब से संबंध, मैमसाब को सलाम और साब के बेटे को प्‍यार किया तो पुरस्‍कार मिलेगा नहीं तो दूसरों की तरह बस सपने ही सपने दिखाई देंगे। इसी सोच के साथ मैंने 15 अगस्‍त का इंतजार शुरू कर दिया। (व्‍यंग्‍य)

Monday, January 26, 2009

कैसा गण और कैसा तंत्र?


आज कौन सा गणतंत्र दिवस है। मुझे भी साठवां गणतंत्र दिवस लिखने में असमंजस हो रहा है, कहीं उनसठवा तो नहीं है। मुझे ही क्‍यों इस हिन्‍दूस्‍तान में मेरे जैसे हजारों युवा होंगे , जिन्‍हें ठीक से याद नहीं कि हम गणतंत्र दिवस की कौनसी सुबह मना रहे हैं। कारण साफ है कि हमें गणतंत्र दिवस से कोई सरोकार ही नहीं है। सरकारी कर्मचारी इसे अवकाश पर्व के रूप में जानते हैं तो बच्‍चे एक दिन स्‍कूल से मुक्ति के रूप में। लगभग हर जिले में यह आयोजन प्रशासन के लिए एक बडी 'आफत' है, क्‍योंकि छोटी सी खामी बडा मुद़दा बन सकती है। इसलिए जैसे तैसे इसका आयोजन ठीक ठाक करने की कवायद होती है। लगभग हर जगह गणतंत्र दिवस को महज औपचारिकत रूप से मनाया जाता है। आम आदमी भी कहां गणतंत्र दिवस के मायने समझ पा रहा है। मेरे इस ब्‍लॉग को कुछ विदेशों में रहने वाले हिन्‍दूस्‍तानी भी पढ रहे हैं, मैं बताना चाहूंगा कि देश में ही अधिकांश जिला मुख्‍यालयों पर यह पर्व तो मनाया जाता है लेकिन यहां दर्शकों के पवेलियन खाली ही दिखाई देते हैं। बात सामान्‍य विद्यालय की हो या फिर बडे महकमें की, गणतंत्र दिवस महज औपचारिक है। 
दसअसल गणतंत्र के मायने हम समझ ही नहीं पा रहे हैं। हर रोज इसी उसी कानून व्‍यवस्‍था और संविधान की धज्जियां उडा रहे हैं जिसकी स्‍थापना आज के दिन हुई थी। यह चिंता का विषय है कि हमारे देश में कानून बाद में बनता है और उसको तोडने की योजना पहले ही बननी शुरू हो जाती है। हम अपने अधिकारों के प्रति तो आवश्‍यकता से अधिक सजग है लेकिन अपने दायित्‍वों को भूल जाते हैं। कर्मचारी छठे वेतन आयोग के लिए हडताल भी कर सकते हैं और नारेबाजी भी लेकिन सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक कार्यालय में बैठना मुश्किल है, अधिकारी जिस कानून की पालना के लिए दूसरे को सजा देते हैं, स्‍वयं उसकी पालना करने में स्‍वयं को 'छोटा' महसूस करते हैं। सिर पर हेलमेट नहीं लगाने पर पकडे जाने पर जुर्माना देने के बजाय दस लोगों को फोन करते हैं और अपना लाभ पाने के लिए दूसरों का हक छोड देते हैं। अस्‍पताल में मुफ़त की दवा और इलाज पाने के लिए बडी शान से 'पूअर' होने का प्रमाण चिकित्‍सक से ले लेते हैं, नौकरी पाने के लिए फर्जी प्रमाण पत्र जुटा लेते हैं। भ्रष्‍टाचार तब तक नहीं करते जब तक यह अपने बूते में नहीं हो। बाहर बैठकर खूब बोलते है और अंदर जिम्‍मेदारी संभालने पर पुराने को भला कहलवा देते हैं, विपक्ष में रहकर सरकार की बुराई नेताओं का धर्म है तो पक्ष में रहकर परिजनों को लाभ पहुंचाना ही असली तंत्र की पहचान है। 

मैं यहां कुछ प्रश्‍न रख रहा हूं, अगर इनका जवाब हां है तो आप स्‍वयं को एक अंक देवें और नहीं है तो स्‍वयं को उस प्रश्‍न का शून्‍य अंक देवें। दस अंक में से स्‍वयं की निष्‍ठा का आकलन करें।
1 आप अपने कार्यालय में समय पर पहुंचते हैं और समय पर ही वापस निकलते हैं।
2 आपने कभी भी अनुपस्थित होकर भी अगले दिन रजिस्‍टर में उपस्थिति दर्ज नहीं कराई।
3 यातायात नियमों की पालना हमेशा की है।
4 किसी से एक रुपया भी रिश्‍वत के रूप में नहीं लिया।
5 नियमों से हटकर कभी कोई काम नहीं किया।
6 कहीं नियमों की अवहेलना होने पर संबंधित सूचना मिली तो अधिकारी व प्रबंधन को इससे अवगत कराया।
7 अपने बच्‍चों से कभी किसी तरह का कोई झूठ न बोला और न बोलने के लिए कहा।
8 कभी किसी गरीब का लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया।
9 कभी अपने पद के नाम पर किसी तरह की सहायता नहीं ली।
10 कभी अपने देश के संविधान को पढा है।
उम्‍मीद है आप अपना आंकलन पूरी ईमानदारी के साथ करेंगे।
सपना है कि जिस तरह देश में स्‍वतंत्रता आई, ठीक वैसे ही एक दिन गणतंत्रता भी आएगी।

Saturday, January 24, 2009

एक मुलाकात अमिताभ बच्‍चन से


जयपुर में इन दिनों चल रहे साहित्‍योत्‍सव में आए अमिताभ बच्‍चन को राजस्‍थान पत्रिका के मुख पृष्‍ठ पर देखकर कुछ पुरानी बातें याद आ गई। आपके साथ बांटना चाहूंगा। पत्रकारिता के दस वर्ष के जीवन में कुछ पल अविस्‍मरणीय है तो उनमें एक अमिताभ बच्‍चन से मुलाकात भी है। मैं और मेरे जैसे हजारों पत्रकारों ने अमिताभ बच्‍चन के साथ साक्षात्‍कार किया होगा लेकिन मेरे लिए साक्षात्‍कार और साक्षात्‍कार और साक्षात्‍कार से पहले के हालात दोनों ही अपरिकल्‍पनीय है। अमिताभ बच्‍चन ने दोनों बार  बीकानेर में अमिताभ बच्‍चन अपनी फिल्‍म वतन तुम्‍हारे हवाले साथियों की शुटिंग के लिए आए थे। हमारे साथी बृजमोहन आचार्य को अमिताभ बच्‍चन से बातचीत के लिए जिम्‍मेदारी सौंपी गई। सुबह सवेरे ही वो बीकानेर के लालगढ पैलेस पहुंच गए। अमिताभ बच्‍चन यहीं रुके हुए थे। शूटिंग के लिए निकलते वक्‍त दो मिनट का वक्‍त भी मिलता तो हमारा काम बन जाता। काफी देर इंतजार के बाद भी अमिताभ बच्‍चन से मुलाकात तो दूर एक झलक तक देखने को नहीं मिली। सुबह से शाम हो गई लेकिन हजारों दीवानों की तरह हम भी परेशान होते रहे। हमारी परेशानी देखकर महाभारत धारावाहिक में द्रौणाचार्य की भूमिका निभाने वाले सिंह ने हैरान थे। सब लोग अमिताभ बच्‍चन के साथ शूटिंग वाले स्‍थान के लिए रवाना हो गए लेकिन हमारे रिपोर्टर वहीं जमे हुए थे। इस पर सिंह ने कहा कि अमिताभ बच्‍चन जैसे संवेदनशील व्‍यक्ति फिल्‍म जगत में कोई नहीं है। उन्‍होंने युक्ति सुझाई जो काम आ गई। बृजमोहन जी ने एक कागज पर लिखा कि आपका साक्षात्‍कार करना मेरे लिए बहुत आवश्‍यक है, आपके दो मिनट ही मेरे लिए महत्‍वपूर्ण होंगे। यह कागज सिंह के सहयोग से हमने अमिताभ बच्‍चन के कमरे में दरवाजे के नीचे से डाल दिया। शाम को जब अमिताभ बच्‍चन शूटिंग से लौटे तक तक शाम के सात बज गए। सुबह से ड़यूटी पर तैनात बृजमोहन को रीलिव करके मैं वहां खडा हो गया। वो अभी होटल से बाहर ही निकला होगा कि एक सज्‍जन बाहर रिसेप्‍शन आया और बोला राजस्‍थान पत्रिका से कौन है? जिसने अमित जी के कमरे में पत्र डाला था। मैंने कहा वो मेरे साथी थे, अब उनकी जगह मैं हूं। उन्‍होंने कहा कि सिर्फ आपसे अमिताभ जी मिलना चाहते हैं। अमिताभ से मिलने के लिए सुबह से रात तक मेहनत करने वाले बृजमोहन की मेहनत को मैं दरकिनार नहीं कर सकता था, उन्‍हें वापस बुलाया। हम लोग अमिताभ बच्‍चन से दो मिनट के बजाय बीस मिनट तक मिले। उन्‍होंने हमारे हर सवाल का जवाब बडे मजे से दिया। कभी हंसे तो कभी गंभीर हुए। जब हमने हरिवंशराय बच्‍चन का नाम लिया तो बिग बी गंभीर हो गए। उन्‍होंने अग्निपथ की वो पंक्तियां :: तो कर शपथ अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ:: भी सुनाई जो उन्‍होंने अपनी फिल्‍म में भी बोली थी। पिता के जाने का दर्द उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था। जब हमने उनके जीवन पर फिल्‍म बनने की बात पूछी तो हंस पडे बिल्‍कुल बच्‍चों की तरह। बोले ऐसा हुआ तो फिल्‍म फ़लाप हो जाएगी। यह पहला अवसर था जब हम सवाल पूछते थक गए लेकिन अमिताभ बच्‍चन बिल्‍कुल नहीं थके। 
इसके बाद द्रोण फिल्‍म की शूटिंग के लिए अमिताभ बच्‍चन के बेटे अभिषेक बच्‍चन बीकानेर आए। यहां उनसे भी बातचीत करने का अवसर मिला। लेकिन सच अमिताभ बच्‍चन तक पहुंचना अभिषेक बच्‍चन के लिए बहुत मुश्किल नहीं शायद असंभव है। फोटो वेबसाइट से

Tuesday, January 20, 2009

वो खा जाते हैं मां का कलेजा?


पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ मेरे छह दिन काफी रोमांचक रहे लेकिन उस पल को मैं कभी नहीं भूल सकता, जब उन्‍होंने अपने यहां के खानपान के बारे में बताते हुए कहा कि हमारे पाकिस्‍तान में गाय के मांस को सर्वाधिक पसन्‍द किया जाता है।मैंने उसे फिर से पूछा ? उसका जवाब फिर से यही था गाय का। मुझे ऐसे लगा जैसे मां के कलेजे को खाने से भी वो गुरेज नहीं करते। मुझे पहले तो विश्‍वास नहीं हुआ लेकिन जब सौहेल, अशफाक और जुबैर तीनों ने ही इसकी पुष्टि की तो भारी मन से इस घृणित सच को मान लिया। सौहेल ने बताया कि पाकिस्‍तान के हर शहर में गाय का मांस आसानी से उपलब्‍ध हो जाता है। जिस तरह भारत में लोग बकरे का लालन पालन करते हैं ठीक वैसे ही पाकिस्‍तान में गाय का पालन होता है। उन्‍होंने गौ वध पर बहुत कुछ कहा लेकिन वो सब इतना अशोभनीय और दुखदायी है कि मैं इसे लिखने की हिम्‍मत नहीं कर पा रहा। जितना आश्‍चर्य मुझे इस सच पर उतना ही आश्‍चर्य उन्‍हें मेरी बात सुनकर भी हुआ। मैंने बताया कि आप जिसका वध करते हैं, उसे मेरे भारत में मां का दर्जा मिला हुआ है। गाय को मां से कम तो कभी माना ही नहीं गया। जिस तरह बचपन में मां का दूध जीवन देता है ठीक वैसे ही गाय का दूध इस जीवन को स्‍थायी रखता है। भारत में गाय का मांस सुनकर लोगों का कलेजा कांप जाता है। तब सौहेल ने बताया कि पाकिस्‍तान के हिन्‍दू प्रभावी क्षेत्र में गाय का मांस अघोषित रूप से वर्जित है लेकिन यह क्षेत्र काफी छोटा है या यूं कहें कि नगण्‍य है। मुझे उनकी इस बात पर भी विश्‍वास नहीं हुआ कि गायों की आपूर्ति कई बार तो भारत से ही होती है। तस्‍करी के रूप में गाय पाकिस्‍तान पहुंचती और वहां इनका वध कर दिया जाता है। भारतीय गाय काफी स्‍वस्‍थ होती है इसलिए इसका सेवन भी बडे चाव से होता है। भारत से गायों की तस्‍करी होने के कई मामले मैने सुने है लेकिन मुझे सौहेल की इस बात पर जरा भी विश्‍वास नहीं था। क्‍या इनसान इतना भी अमानवीय हो सकता है जो मांस तो मांस गाय के मांस तक को खा जाए। अगर पाकिस्‍तान में सच में ऐसा होता है तो समझ में आता है कि वहां इंसानीयत क्‍यों नहीं पनप रही। मैंने अपने अल्‍प ज्ञान के दम पर ही उन्‍हें गाय की महत्‍ता बताई। तब उन्‍होंने भविष्‍य में गाय का मांस नहीं खाने का विश्‍वास दिलाया जो मेरे लिए आज भी अविश्‍वसनीय है। हे भगवान, उन्‍हें अपने वचन पर दृढ रहने की शक्ति देना।

Monday, January 19, 2009

सेना से परेशान पाकिस्‍तान

पत्रकार के मन में सच्‍ची बात कभी दफन नहीं होती। कभी भी न कभी वो बोलेगा और बिंदास बोलेगा। जो गलत है उसे गलत ही बताएगा, कभी किसी के दबाव में चुप रह सकता है लेकिन मौका मिला तो चिल्‍ला चिल्‍लाकर कहेगा। कुछ ऐसा ही एहसास मुझे नेपाल यात्रा के दौरान भी हुआ। पाकिस्‍तानी पत्रकारों के मन से एक एक बात जैसे छनकर आ रही थी। इन सबमें सर्वाधिक बिंदास बोलने वाला सौहेल था लेकिन बात जब सेना की आई तो कभी कभार ही जुबान खोलने वाले अशफाक ने भी अपनी भडास निकाली। तब (सितम्‍बर 2006 में) पाकिस्‍तान में परवेज मुशर्रफ का राज था। इन पत्रकारों ने बताया कि सेना ने ही पाकिस्‍तान को बर्बाद कर रखा है। तब उन्‍हें उम्‍मीद नहीं थी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब परवेज मुशर्रफ राष्‍ट़पति नहीं होंगे। सौहेल और जुबैर ने बताया कि पाकिस्‍तानी सेना ने किस कदर वहां आम आदमी के अधिकारों का हनन किया है। सेना के अधिकारी को सेना में प्रवेश के साथ ही भारी भरकम वेतन के साथ ही देशभर में कहीं भी बकायदा भूमि आवंटित होती है। इतना ही नहीं सेवानिवृति के बाद भी उसे भूमि आवंटित होती है। यह भूमि इतनी लम्‍बी चौडी होती है कि आम आदमी के लिए उसके आसपास की भूमि खरीदना ही संभव नहीं है। ऐसे में पाकिस्‍तान के प्रमुख शहरों व कस्‍बों में सेना के अधिकारियों का ही दबदबा है। सेना के अधिकारी देश के बारे में कम और अपने वेतन व सुख सुविधाओं के बारे में ज्‍यादा सोचते हैं। परवेज मुशर्रफ के वक्‍त सेना के अधिकारियों को इतना दिया गया कि आम आदमी में आक्रोश व्‍याप्‍त हो गया। न सिर्फ भूमि बल्कि हर काम में सेना को ही प्राथमिकता दी गई। देश की सुरक्षा के लिए सेना को प्रोत्‍साहित करना तो ठीक है लेकिन आम आदमी का हक मारकर सेना को खुश किया गया। उनका मानना था कि पाकिस्‍तान में सेना ही सबसे बडी समस्‍या है। अराजकता के लिए सेना जिम्‍मेदार है तो देश की तंग माली हालत भी सेना की बदौलत ही बिगडी है। सेना के आला अधिकारी पाकिस्‍तान में हर रोज अपनी सम्‍पत्ति को चार गुना कर रहे हैं और आम आदमी की जिंदगी में चार दिन भी चांदनी के नहीं आते। पाकिस्‍तान सेना के युद़ध में कमजोर और भ्रष्‍टाचार में आगे होने की बात सभी पाकिस्‍तानी साथियों ने स्‍वीकार की। इतना ही नहीं आए दिन पाकिस्‍तानी सैनिकों की ओर से अवैधानिक कृत्‍य करने और उनके खिलाफ कार्रवाई भी नहीं हो रही। उनका मानना था कि पाकिस्‍तान में अगर भारत की तरह शुरू से ही लोकतंत्र को मजबूत किया जाता तो आज ऐसे हालात नहीं होते। पाकिस्‍तानी साथियों ने तो यहां तक कहा कि महज अपने लाभ के लिए पाकिस्‍तानी सेना भारत के साथ संबंध बिगाड के रखती है। मैं आज भी इन साथियों की बात से सहमत हूं कि वहां का आम आदमी आज भी भारत से बेहतर संबंध रखना चाहता है। दोनों के बीच आडे आ रही है तो नेताओं और सेना की जिद। वो भी मानते हैं कि भारत का रुख सदैव सकारात्‍मक रहा है।

Saturday, January 17, 2009

मंदिर और पाकिस्‍तानी पत्रकार


पॅनास की कार्यशाला में हम पत्रकार कम और विद़यार्थी अधिक थे। ऐसे में हमें बहुत कम समय नेपाल की यात्रा के लिए मिल पाता था। शाम को छह बजे बाद घूमते लेकिन आठ बजे तक अधिकांश बाजार बंद हो जाते। ऐसे में विश्‍वविख्‍यात पशुपति नाथ मंदिर में दर्शन की उम्‍मीद नहीं थी। आयोजक जानते थे कि भारत से आए पत्रकारों के लिए नेपाल का अर्थ ही पशुपतिनाथ मंदिर है। वहां आयोजकों विशेषकर मीतू व डैनी ने हमारे लिए एक दिन सत्र को आधा करके पशुपतिनाथ मंदिर यात्रा की व्‍यवस्‍था की। हमारे साथ पाकिस्‍तानी पत्रकार बतुल भी हो गई। हम जैसे ही पशुपति नाथ पहुंचे वहां सभी अलग अलग हो गए। वहां का अद़भूत दृश्‍य मन को सुकून देने वाला था। पाश्‍चात्‍य शैली में सजे धजे मकान और भगवा रंग से अटे साधु महात्‍माओं का जमावडा काफी प्रभावित करने वाला था। पशुपति नाथ के मुख्‍य द्वार पर पहुंचते ही मन भक्ति से ओतप्रोत हो गया। अंदर पांव रखा तो अपने कद से कई गुना ऊंचा नन्‍दी को निहारते ही रह गए। मंदिर में दर्शन करने में  हमें करीब आधा घंटा लगा। पशुपति नाथ का दर्शन करके लगा कि जीवन में जो तीर्थ अंतिम पडाव में होता है वो बहुत पहले करने का अवसर मिल गया। मैं दर्शन करके बाहर आया तो वहां एक बोर्ड पर लिखा था केवल हिन्‍दूओं के लिए प्रवेश यह देखकर मुझे आश्‍चर्य हुआ क्‍योंकि आमतौर पर भारत में भी मंदिरों पर ऐसे बोर्ड दिखाई नहीं देते। तब तक नेपाल एकमात्र हिन्‍दू देश होने का अभिमान भी खो चुका था। अभी मैं इस बोर्ड पर अपना चिंतन कर ही रहा था कि मुझे मंदिर में से बतुल निकलती हुई दिखाई दी। नि:संदेश बतुल मुसलमान थी और नियमानुसार उसका मंदिर में जाना अनुचित था। मैंने बोर्ड की तरफ इशारा किया। जिसमें हिन्‍दी में लिखा वो समझ नहीं सकी। तब मैंने अर्थ  बताया।  उसने आश्‍चर्य जताया लेकिन अपनी मंदिर यात्रा से काफी रोमांचक नजर आई। बतुल ने जिस श्रृद्वा के साथ हाथ जोडे, अपना सिर ढका और निकलते धोक दी, कहीं नहीं लग रहा था कि वो हिन्‍दू व्‍यवस्‍था से अनभिज्ञ है। इतना ही नहीं बतुल ने बोर्ड से नजर हटाकर मंदिर की तरफ मुंह करके क्षमा याचना भी की। लेकिन मंदिर दर्शन का गर्व कम नहीं हुआ।  बतुल ने मंदिर के बारे में कुछ जानकारी दी तो हमें आश्‍चर्य हुआ। दरअसल, वो इस मंदिर के बारे में पहले से जानती थी। यह मेरी भावुकता थी या मूर्खता मुझे नहीं पता लेकिन उसके मंदिर प्रवेश पर मुझे किंचितमात्र भी आपत्ति नहीं थी। उसके धार्मिक भाव का दर्शन चेहरे से किया जा सकता था, ईश्‍वर के प्रति उसकी आस्‍था उसके व्‍यवहार में झलक रही थी। वो मंदिर में आने से पहले संभवत: इंटरनेट से इस मंदिर के बारे में कुछ सामान्‍य ज्ञान लेकर पहुंची थी। मंदिर दर्शन के बाद जब हम रात को एक होटल में खाने के लिए बैठे तो मैंने पाकिस्‍तानी पत्रकारों के समक्ष इस सवाल को रखा कि क्‍या पाकिस्‍तान में मंदिर है। सौहेल ने बताया कि पाकिस्‍तान में मंदिरों की कमी नहीं है। कट़टरवाद हावी होने के बावजूद वहां मंदिर अपनी जगह कायम हैं और नियमित रूप से इन मंदिरों में पूजा होती है। मंदिरों को तोडने की खबरों को भी उसने गलत नहीं माना। सौहेल का कहना था कि कट़टरवाद के कारण कई बार ऐसा हुआ लेकिन पाकिस्‍तान का आम आदमी मंदिर को लेकर परेशान नहीं है। इतना ही नहीं कई जगह तो मंदिरों के आयोजन में वहां के मुसलमान हिस्‍सा भी बनते हैं। मंदिर के पुजारियों से लोगों के घरेलू संबंध हैं। रात के समय इन मंदिरों से घंटियों की आवाज सुनाई देती है। इसके बावजूद सौहेल ने माना कि पाकिस्‍तान में हिन्‍दूवादी व्‍यवस्‍था के लिए ज्‍यादा जगह नहीं है क्‍योंकि कट़टरवाद लगातार बढ रहा है। स्‍वयं सौहेल इस स्थिति से प्रसन्‍न नहीं था। अशफाक और जुबैर अंजुम ने भी पाकिस्‍तान में भारतीय मंदिरों की अच्‍छी स्थिति बताई। आज के हालात में जब पाकिस्‍तान से बडी संख्‍या में हिन्‍दू पलायन करके भारत आ रहे हैं, अकेले राजस्‍थान से सटी पाक सीमा पर ही एक लाख पाकविस्‍थापित है। इनमें हजारों को तो बकायदा भारतीय नागरिकता दी जा चुकी है। बीकानेर की खाजूवाला विधानसभा सीट सहित राजस्‍थान की कुछ सीटों पर तो बकायदा पाक विस्‍थापित इतनी संख्‍या में है कि हार जीत में भूमिका भी निभाते हैं। एक सीट पर तो पाक विस्‍थापित जीतकर विधायक बन चुका है। ऐसे में वहां हिन्‍दू की अच्‍छी स्थिति होने की पाकिस्‍तानी पत्रकारों की बात अब हजम नहीं हो रही। तमन्‍ना है कि एक दिन ऐसा भी आए जब मुझे पाकिस्‍तान जाने का मौका मिले और मैं उन मंदिरों का दर्शन करके आऊं, जिन्‍हें मेरे पत्रकार साथियों ने अच्‍छी स्थिति में बताया था।

Thursday, January 15, 2009

पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ पहला दिन

11 सितम्‍बर 2006 को हमारा पहला दिन पनॉस साउथ एशिया के मीडिया सेंटर में था। हमें हर हाल में दस बजे काठमांडू में ही स्थित पनॉस के मीडिया सेंटर पर उपस्थिति देनी थी। नेपाल के प्रतिष्ठित समाचार पत्र नेपाली टाइम्‍स व मैगजिन हिमालयन के कार्यालय से कुछ ही दूरी में एक गली में लेकिन हरियाली से लखदख थी यह गली। पनॉस का कार्यालय छोटा लेकिन हम बारह पत्रकारों के लिए बना मीडिया सेंटर विशेष छोटा नहीं लग रहा था। हम सभी वहां पहुंचे तो औपचारिक परिचय हुआ। औपचारिक इसलिए क्‍योंकि हम पहले ही होटल में साथ साथ रह चुके थे और नाम से एक दूसरे को पहचान गए। हमारे बीच में दो अनजान चेहरे थे। सोचा दोनों ही भारत के प्रमुख समाचार पत्र से होंगे। फिर सोचा दोनों में एक भारतीय और दूसरा पाकिस्‍तानी होगा। अभी चिंतन चल ही रहा था कि यह परिचय करा दिया गया कि दोनों मंचस्‍थ पाकिस्‍तान के हैं। हमारा तो जैसे मूड ही ऑफ हो गया। पाकिस्‍तानी पत्रकारों से  हमें क्‍या सरोकार। हमारी कार्याशाला का विषय था   "Absence of war is not peace" जिन लोगों को वार के अलावा कुछ आता नहीं उनसे पीस की बात सुनना हमारा लिए आश्‍चर्यजनक था। मूल रूप से हमें यह सिखाने का प्रयास भी हुआ कि जब देश में युद़ध के हालात हो या फिर बडा झगडा फसाद हो तो किस तरह से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। सबसे पहले पाकिस्‍तानी पत्रकार जाहिद हुसैन ने हमें पाकिस्‍तान के हालात बताने शुरू किए। उन्‍होंने बेबाक तरीके से कहा कि विकट परिस्थितियों में रिपोर्टिंग का जितना अवसर पाकिस्‍तानी पत्रकार को मिल रहा है, उतना भारतीय पत्रकार को नहीं मिल रहा। कारण साफ है कि पाकिस्‍तान में हर तरफ से हमला हो रहा है। घर के अंदर हमला, बाहर से हमला और अपने ही पाले ही हुए लोगों का हमला। अपने करीब दो घंटे के लेक्‍चर में उन्‍होंने पाकिस्‍तान की दुर्दशा का बकायदा चित्रण किया। तत्‍कालीन राष्‍टपति परवेज मुशर्रफ के कारण बिगडे हालात का भी जिक्र किया। उन्‍होंने ऐसे हालात में हो रही पत्रकारिता के कुछ नमूने भी गिनाए। हुसैन यह कहने से नहीं हिचकिचाए कि पाकिस्‍तान में पत्रकारिता कठिन काम है। पाकिस्‍तान में सिर्फ भारत से युद़ध ही युद़ध नहीं है बल्कि घर में ही कई तरह के युद़ध चल रहे हैं। ऐसे में भारत से युदध्‍़ा नहीं होने का आशय पाकिस्‍तान में शांति होना वाकय नहीं था। इसके बाद भारत पाक सीईओ बिजनस फार्म के अध्‍यक्ष आमीन हासवानी ने भी अपनी बात कही। पहले पाकिस्‍तानी पत्रकार ने जिस संजीदगी के साथ अपनी बात कही और पाकिस्‍तान की दुर्दशा बयां कि उससे विपरीत हाशमी ने भारतीय मीडिया पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए। उन्‍होंने यहां तक कह दिया कि जब क्रिकेट मैच होता है तो भारतीय मीडिया पाकिस्‍तान की खिलाफत करता है। मेरे एक सवाल से वो नाराज हुए कि जब मियादाद मैदान में कूदता है तो उसे जं‍पिंग मियादाद के अलावा क्‍या कहा जा सकता है। उन्‍होंने बताया कि जब पाकिस्‍तान के सीईओ भारत आए तो तत्‍कालीन मंत्री यशवंत सिन्‍हा ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। भारतीय मीडिया और नेताओं में पाकिस्‍तान के प्रति दुर्भावना है। उनका यह कथन चुभने वाला था। भारतीय मंत्री से नहीं मिलने देने का अपना दुखडा काफी देर तक हमारे सामने रोया। हाशमी की किसी भी बात से विषय का कोई सरोकार नहीं था। हम पहले लेक्‍चर से जहां प्रभावित हुए, वहीं दूसरे वक्‍तव्‍य पर निराश हुए।  एक बार तो बात बिगड रही थी लेकिन जैसे तैसे सुधर गई। दरअसल मुझे लगा कि हाशमी पत्रकार थे ही नहीं। उन्‍होंने तो भडास ही निकालनी थी। हमारे विरोधात्‍मक सवालों के बाद उन्‍होंने अपनी बात संक्षिप्‍त कर दी। क्रिकेट को लेकर उनकी टिप्‍पणियों का जवाब देते हुए तो हमें ऐसे महसूस हो रहा था जैसे हम भी क्रिकेट के मैदान में ही खडे हैं और हर हाल में सामने वाले को जवाब देना है। पहले दिन के इस अनुभव के बाद हमारी शाम एकदम अलग थी। जिन मुद़दों पर सुबह हुसैन ने चर्चा की थी, उन्‍हीं पर हमने शाम को बाजार में घूमते घूमते पाकिस्‍तानी पत्रकारों से चर्चा की। उनकी विचारधारा उम्‍मीद से विपरीत थी। हमारी चर्चा का मूल आधार परवेज मुशर्रफ और पाकिस्‍तानी सेना था। इन पर पाकिस्‍तानी पत्रकार सौहेल और जुबैर की बात सुनकर मैं स्‍वयं दंग रह गया। 
इस पर चर्चा कल ही कर सकेंगे। 

Wednesday, January 14, 2009

छह दिन पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ


आज जब समूचा मीडिया भारत और पाकिस्‍तान के बीच संघर्ष की नींव रखने में जुटा है। ऐसे में पाकिस्‍तानी पत्रकारों को मित्र कहना शायद कुछ लोगों को अच्‍छा नहीं लगे। पिछले कुछ दिनों से सोच रहा था कि इस मुद़दे पर ब्‍लॉग पर लिखूं या नहीं। फिर सोचा अपना विचार तो रखना ही चाहिए। इसीलिए मैं पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ गुजारे छह दिन की यात्रा आपके साथ लगातार छह दिन ही बांटना चाहूंगा। 
सितम्‍बर 2006 में मुझे अपने समाचार पत्र राजस्‍थान पत्रिका के माध्‍यम से नेपाल के काठमांडू में आयोजित छह दिवसीय कार्यशाला में हिस्‍सा लेने का अवसर मिला। इस कार्यशाला में भारत  और पाकिस्‍तान से छह छह पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था। विशेष बात यह थी कि दोनों ही देशों के भारत सीमा के निकटवर्ती रहने वाले लोगों को पेनॉस साउथ एशिया नामक इस संस्‍थान ने आमंत्रित किया था। पाकिस्‍तान के सीमावर्ती भारत के बीकानेर में रहने का लाभ मुझे मिला। भारत से मेरे साथ चण्‍डीगढ की कंचन वासदेव, गुजरात के उर्वेश कोठारी, कश्‍मीर टाइम्‍स के अरुण शर्मा, हैडलाइन टूडे के सक्‍का जैकब भी थे। इसके अलावा जी न्‍यूज  के पत्रकार राहुल सिन्‍हा का भी चयन हुआ लेकिन वो आये नहीं। वहां हमें काठमांडू के होटल हिमालय में आवास की सुविधा दी गई। यह लगभग फाइव स्‍टार होटल था और इसे देखकर नहीं लगता था कि नेपाल छोटा देश है और यहां सुविधाएं नहीं है। खैर  होटल हमारा विषय नहीं है। हम पाकिस्‍तानी पत्रकारों से पहले ही नेपाल पहुंच गए थे, इसलिए पहले हमें होटल पहुंचने का अवसर मिला। ऐसे में सभी भारतीय पत्रकारों के नाम से एक एक कमरा आवंटित हो गया। कुछ ही देर में पाकिस्‍तानी पत्रकार भी वहां पहुंच गए। अभी हम अपने अपने कमरे में सामान रखकर बतिया रहे थे कि रिसेप्‍शन से फोन आया कि पाकिस्‍तानी पत्रकार भी आपके साथ ही रहेंगे। यानि एक कमरे में एक भारतीय और एक पाकिस्‍तानी पत्रकार छह दिन तक साथ साथ रहेंगे। मैं और मेरे साथी चकित थे। हमने रिसेप्‍शन पर पहुंचकर इसका विरोध किया। हमें पाकिस्‍तानी शब्‍द ही अच्‍छा नहीं लग रहा था ऐसे में उनके साथ छह दिन रहना, हमारे लिए मानों कोई अत्‍याचार था। रिसेप्‍शन पर पहुंचने पर पता चला कि जिस संस्‍था ने हमें यहां आमंत्रित किया है, उसी के संचालकों ने यह व्‍यवस्‍था की है। उन्‍हीं में से एक डैनी से हमने बातचीत की। उन्‍होंने बताया कि दोनों देशों के पत्रकार साथ रहेंगे तभी तो एक दूसरे को समझेंगे, एक दूसरे की समस्‍या को समझ सकेंगे। हमने जैसे तैसे भारी मन से पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ रहने की स्‍वीकृति दे दी। अब मेरे साथ एक पाकिस्‍तानी पत्रकार अशफाक को मेरे साथ जोडा गया। अशफाक वहां के दैनिक समाचार पत्र डॉन से जुडा हुआ था। हमारे साथ पाकिस्‍तान की पत्रकार बतुल फातमा भी थे जो आजकल पाकिस्‍तान में असिस्‍टेंट ऑडिट जनरल है। यानि अब पत्रकार नहीं बल्कि पाकिस्‍तानी ब्‍यूरोक्रेट है। छह दिन तक हम लोगों ने एक दूसरे को समझा। एक दूसरे के साथ घूमे, मौज मस्‍ती की। अपने मन में पाकिस्‍तान के बारे में जो सवाल थे वो सब किए। इतने किए कि पाकिस्‍तानी मित्र भी बोल देते यार आप पाकिस्‍तान के बारे में ऐसा क्‍यों सोचते हैं। हमार सवाल होता कि आप भारत के बारे में क्‍यों सोचते  हैं? हमारी बातों में कभी अमिताभ बच्‍चन होते तो कभी शोएब अख्‍तर और मियादाद। कभी पाकिस्‍तान के मंदिरों पर चर्चा होती कभी कभी भारत की मस्जिदों पर। कभी गाय की पूजा पर चर्चा होती कभी पाकिस्‍तान में गायों के वध पर। बहुत बातें हुई, कुछ सलवट कम हुई तो कुछ बढी। जैसा भी छह दिन का सफर रहा, वैसा ही आपके साथ बाटूंगा। बस हर रोज हमें याद करते रहिए।