Thursday, February 26, 2009

पधारो म्‍हारे सैर बीकानेर


शहर के ठीक बीच में खडे होकर किसी भी दिशा में पांच किलोमीटर के लिए निकल जाए आपको समुंद्र नजर आएगा।मिट़टी का समुंद्र। दूर तक इंसान तो क्‍या घास फूस भी नहीं दिखेगा। कुलाचे मारता हरिण आपका मनोरंजन कर सकता है तो कभी कभार ऊंट पर लदे बच्‍चे  आपके आगे से गुजरते हुए अपनी हंसी से आपको गुदगुदा सकते हैं। ढेढ देहाती अंदाज में यहां का ग्रामीण सिर पर पगडी बांधे आपको जींस और टी शर्ट में अचरज भरा देख सकता है। औरतों का चेहरा देखना आपकी किस्‍मत में नहीं  होगा, क्‍योंकि मुंह ढककर चलने की परम्‍परा को यहां के बाशिन्‍दे आज भी निभा रहे हैं। यह बीकानेर है। आप शायद बीकानेर को पापड और भुजिया के लिए जानते होंगे या फिर हमारे नए सितारे संदीप आचार्य, राजा हसन और समीर (तीनों युवा गायक)  के कारण जानते होंगे। मैं आपको अपने शहर में इसलिए लाया हूं क्‍योंकि यहां घूमने का मजा इन्‍हीं दिनों में है। आप यहां आ नहीं सकते, इसलिए यहां की मस्‍ती से मैं आपको नियमित रूप से रूबरू करने का प्रयास करूंगा। इस शहर की मस्‍ती दुनिया के किसी भी शहर के आगे ज्‍यादा चमक रखने वाली है। यहां के लोग इतने संतोषप्रद है कि बडी से बडी समस्‍या को झेल लेंगे लेकिन झगडा नहीं करेंगे। यहां हिन्‍दू भी है और मुसलमान भी। दोनों बडी संख्‍या में है फिर भी कभी साम्‍प्रदायिकता ने इस शहर को अपनी जद में नहीं लिया। ऐसे मुसलमान भी है जो ब्राह़मणों की तरह प्‍याज तक नहीं खाते तो ऐसे हिन्‍दू भी है जो मुसलमानों के घर को अपना परिवार समझते हैं। होली हो या दीवाली मुस्लिम मोहल्‍ले भी कम रोमांच में नहीं होते। घर पर दीपक भले ही न जले लेकिन पटाखों की धूम और नए कपडे पहनकर शहरभर में घूमने में वो भी पीछे नहीं। रोजे के वक्‍त हिन्‍दूओं के घर खाना बनता है और मुस्लिम के घर जाकर रोजा खुलवाया जाता है। ऐसे परिवारों की संख्‍या लम्‍बी चौडी है जो किसी न किसी रोजेदार को अपने घर का खाना खिलाने की होड में रहता है। यहां जगह जगह दरगाहें हैं। हर छोटे बडे काम के लिए हिन्‍दू इन्‍हीं दरगाहों के आगे मत्‍था टेकते हैं और काम होने पर फिर मत्‍था टेकने जाते हैं। आपने बडे शहरों को रात में जागने के किस्‍से तो सुने होंगे, अब मेरे शहर का नाम भी इसी सूची में डाल दें। बीकानेर शहर रात को भी जागता है। पान की दुकान रात को दो बजे से पहले  बंद नहीं होती और ताश कूटते कूटते चार बजाना यहां हर चौक का शगल है। यहां चौक ठीक वैसे ही हैं, जैसे घर में होते हैं। आप नींद से उठकर सीधे अपने घर के चौक (आंगन) में पहुंचते होंगे, वहीं बैठकर सोफे पर चाय पीते होंगे। मेरे शहर में लोग उठकर सीधे घर से बाहर निकलते हैं चौक में रखे पाटे पर बैठते हैं और वहीं चाय पीते पीते दिनभर का कार्यक्रम तय करते हैं। इन्‍हीं पाटों पर दिन में वृद़ध जन अपनी टीम के साथ बैठकर अखबारों को खंगालते हैं, हर खबर की मुरम्‍मत करते हैं, अमेरिका से लेकर पास वाले चौक तक की खबरों  का आदान प्रदान करते हैं, चर्चा करते हैं, कभी कभी बहस करते हैं और बहस बाद में बोलचाल तक बदल जाती है। अगले ही पल बहस को खत्‍म करने के लिए रबडी मंगा ली जाती है। जिसने ज्‍यादा जोर से बोला उसे रबडी के उतने ही ज्‍यादा पैसे देकर जुर्माना भरना होगा। यहां गलियां छोटी और संकडी है लेकिन दिल बहुत बडे हैं। चौक में सफाई के लिए आने वाली नगर निगम की सफाई कर्मचारी का विवाह चौक वाले कर देते हैं क्‍योंकि उसकी लडकी उनके  देखते देखते बडी हो गई तो चौक की भी बेटी हुई ना। यहां बडे से बडा गम हवा हो जाता है और बडी से बडी खुशी बंटती बंटती सभी का आल्‍हादित कर देती है। पाटा यानि चौक में लगा लकडी का लम्‍बा चौडा तख्‍त। इसी पाटे पर ब्‍याह शादी में दुल्‍हा बैठता है और इसी पाटे पर शोक के दिनों में बैठक होती है। हर पाटे का अपना इतिहास है और पाटे का अपना संघर्ष है। इन पाटों ने शहर को बदलते देखा है और संस्‍कृति के बदलते अंदाज को भोगा है, फिर भी कहूंगा पाटों  के दम  पर ही इस शहर की जीवनशैली आज तक जीवित है। अब आप सोचेंगे कि मैं आपको अचानक अपने शहर की तरफ क्‍यों ले आया। दरअसल मेरे शहर में इन दिनों सर्वाधिक रौनक है। पता नहीं दूसरे शहरों में होली कैसे और कितने दिन मनाते हैं लेकिन मेरे शहर बीकानेर में होली शुरू हो चुकी हैं। चंग की थाप हर किसी को अपनी ओर खींच रही है तो हल्‍की सर्द हवाओं के बीच जगह जगह चंग की धमाल पर स्‍वांग नाचते दिख सकते हैं। अगर आप पसन्‍द करें तो मैं मेरे शहर की होली से आपको हर रोज रूबरू करवा सकता हूं। सिर्फ चंग ही नहीं हर्ष और व्‍यास जाति के बीच होने वाले डोलची खेल में भी आपको ले जाऊंगा। जहां एक एक बार करके हर्ष और व्‍यास जाति के लोग एक दूसरे की पीठ पर पानी से वार करते हैं। यह वार इतना घातक होता है कि दिल में उतर जाता है, जितना तेज पडता है प्‍यार उतना ही बढता है। यहां रंगकर्म का अनूठा अंदाज ''रम्‍मत'' सभी को चौंकाने वाला है। साठ वर्ष का अदाकार जब रात से सुबह तक मंच पर अभिनय करते करते सुबह डॉयलाग बोलता है तो एक किलोमीटर दूर भी लोगों को आवाज बिना माइक के सुनाई देनी है। अगर आप बीकानेर की होली से रूबरू होना चाहते हैं तो इच्‍छा जताए ताकि मैं उतने ही जोश के साथ लिख सकूं।

6 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

jaankaari देने लिए एवं अच्छी पोस्ट के लिए शुक्रिया ....

PN Subramanian said...

बीकानेर के बारे में और ख़ास कर पाटों की बात बड़ी अच्छी लगी. शहर का विवरण देते समय तस्वीर दिखाने में कंजूसी न करें. आभार.

RAJIV MAHESHWARI said...

शहर तो आप का बहुत पहले देख आए थे. पर ये पाटो वाली बात बड़ी अच्छी लगी. अगली कड़ी का इंतजार रहेगा.

Vinay purohit said...

सादगी भरा शहर सादगी भरे लोग .. और फिर भी तीक्ष्ण बुद्धि आपकी तरह.. मेरे महान भारत के साथ बीकानेर की भी जय हो!!

pandit jitender acharya said...

shriman anurag harsh ji aapke dwarapaton ke bare ,ai did gayi jankari bahut hi badhiya lagi. but aapse nivedan he ki logo ko paton ki hakikat ke bare me bhi batayie ki paton me sitting karne wale logo me koyi Dr.,magistret,rts,cysp,leactures, etc. yani bhinna choti moti sabhi prakar ki post wale log aapas me miljulkar rahte hai

RN Bagri said...

bahut khub m sirsa se bilong karta hu aur mujhe rajsthan ki sanskriti pahnava aur geet tatha sahro ke bare me batao ge to interested lagega