Tuesday, June 30, 2009

बिना हिम का हिमाचल भी मनोरम

वैसे तो हिमाचल का अर्थ ही हिम के आंचल में लिपटा मनोरम स्‍थल है लेकिन इस बार हिमाचल हिम से कम और हरियाली से ज्‍यादा अटा हुआ है। हरियाली यहां के लिए कोई नयापन नहीं है लेकिन हम राजस्‍थान के वाशिन्‍दों को यह देखने में भी सुख की अनुभूति होती है। घर से बाहर निकलते ही जिनका मुकाबला मिट़टी के झौंकों से होता है, उन्‍हें दस हरे पेड़ ही आल्‍हादित कर देते हैं। पिछले दिनों गर्मी की छुटि़टयां इसी हरियाली के बीच मनाई। हिमाचल प्रदेश का हम कुछ हिस्‍सा ही देख पाए, लेकिन जितना भी देखा वो अत्‍यंत रमणिक और श्रृंगारित था। हमारा मुख्‍य पड़ाव डलहॉजी रहा। इस नाम से मुझे थोड़ी चिड़ हुई क्‍योंकि इससे कहीं न कहीं गुलामी का आभास हो रहा था। हम लोग पठानकोट से एक टेक्‍सी करके डलहॉजी पहुंचे थे। मां वैष्‍णोदेवी के दर्शन करने के बाद पठानकोट से हमारी यात्रा करीब आठ बजे शुरू हुई। ऐसे में पठानकोट से डलहॉजी तक के सौंदर्य को हम रात के अंधेरे में निहार नहीं पाए। फिर भी क्‍वालिस की अगली सीट पर बैठकर मैंने गहरी खाइयों से आधा फर्लांग दूर रहकर दिल को हथेली पर लेकर चलने का आभास कर लिया था। हमारी गाड़ी में बज रहे गानों के अलावा कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। जो दिख रहा था, वो अंधेरा था। गाड़ी की लाइट से सिर्फ सड़क दिख रही थी। जैसे ही मोड़ आता तो एक गहरी खाई दिखाई देती, जिसमें गिरने वाले का अतापता बमुश्किल ही लगता होगा। ऐसा खयाल तो कई बार आया लेकिन हर बार इससे बचने की कोशिश करते रहे। एक जगह अचानक चालक ने गाड़ी रोक दी, बोला सामने देखो लोमड़ी जा रही है। गाडी की लाइट में पहली बार लोमडी देख बच्‍चे भी खुश हो गए। जैसे तैसे आधा रास्‍ता पार हुआ तो एक ढाबे पर गाडी रोकी गई। चालक ने बोला मैं तो खाना खाऊंगा आप भी कुछ ले सकते हैं। ढाबे की शक्‍ल देखकर खाने का मन तो नहीं हुआ लेकिन पेट में बैठे चूहे शोर कर रहे थे। खाना बिना स्‍वाद भी स्‍वादिस्‍ट लगा। खाने के बाद चालक से पूछा भैया खाना लेने के बाद नींद तो नहीं आती। उसने हंसते हुए पूछा 'राजस्‍थान से आए हो क्‍या?' मैंने कहा, हां। उसने कहा यह बीमारी उधर होगी, यहां तो खाना नहीं खाए तो नींद आती है। आप चिंता मत करो हम डलहॉजी पहुंच जाएंगे। उसके आत्‍मविश्‍वास से हमारा भी विश्‍वास जगा। रात के अंधेरे में जैसे ही सेना के जवानों के चित्र दिखाई दिए, मन को सुकून मिला। डलहॉजी में प्रवेश करते ही सेना का क्षेत्र शुरू हो जाता है। जवानों के आदमकद चित्रों से ही यहां पहुंचने का सुकून मिलना शुरू हो जाता है। रात करीब बारह बजे डलहॉजी में प्रवेश किया। आसानी से हमें होटल भी मिल गया। रात को कुछ भी देखने का मन नहीं था। सीधे कमरे में जाकर सामान 'फैंककर' सो गए। कमरे में घुसने पर पहले तो मैं और पत्‍नी हंसे कि यहां तो बिस्‍तर पर अभी तक रजाई पड़ी है। अभी हंसी खत्‍म ही नहीं हुई कि रजाई का कारण पता चल गया। यात्रा की गर्मी उतरी तो पता चला कि रात को बिना रजाई काम चलने वाला नहीं है। बीकानेर के 45 डिग्री सेल्सियस तापमान से डलहॉजी के संभवत 15... 20 डिग्री सेल्सियस तापमान में ठिठुरना संभव था। हम रात को जैसे'तैसे सो गए। सुबह उठे तो बीकानेर से भाई साहब डॉ राहुल का फोन आया। पूछा कहां हो, मैने कहा कमरे में तो बोले '''उठो जनाब, प्रकृति का शानदार नजारा आपका बेसब्री से इंतजार कर रहा है।''' मैं उठा और खिडकी से बाहर देखा, आंखे फटी की फटी रह गई। हर तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आई। पहाड़ इस कदर सजे धजे थे कि उनकी गोद में जाकर अठखेलियां करने को चंचल मन आतुर हो गया। मैं खुद को रोक नहीं पाया और सीधे होटल के टेरिस पर पहुंच गया। यहां तो आंखों के गोले बाहर आ गए, जीभ मुंह में रुकने को तैयार नहीं, बिना सोचे विचारे जोर से आवाज लगाई '' सेणू.... मिकू'' पत्‍नी और बच्‍चे नीचे से भागकर टेरिस पर पहुंचे। मेरे चिल्‍लाने का कारण वो समझ चुके थे। कुछ देर बाद हमने इसी टेरिस पर कुछ फोटो खींचे। होटल वाले बोल रहे थे जनाब यहां क्‍या फोटो खींच रहे हो। अभी तो देखने के लिए बहुत कुछ है। आपको यहां से आगे भी बहुत दिखेगा। दूर जो बर्फ से ढका पहाड़ है, उसके नजदीक तक पहुंच सकते हो। हालांकि मुश्किल है। इसके बाद हमने एक दिन सिर्फ डलहॉजी ही घूमने का निर्णय किया।
सुभाषचंद्र बोस टीबी होने पर जिस बावड़ी पर छह महीने तक रुके थे वो स्‍थान भी देखा और ''पगड़ी संभाल जट़टा'' का नारा देने वाले सरदार अजीत सिंह की समाधि की दुर्दशा भी देखी। आगे विस्‍तार से चलेंगे। 
आप तो बस इसे श्रृंखला को इयरमार्क कर लें। ::::::

Saturday, June 27, 2009

संभल जाओ दुनिया वालों


केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्‍बल इन दिनों चर्चा में है। दो दिन तक लगातार देशभर के समाचार पत्रों में प्रथम लीड के रूप में प्रकाशित हुए। सिब्‍बल ने कुछ ऐसे ही निर्णय किए थे कि समाचार पत्र उन्‍हें फर्स्‍ट लीड से नीचे नहीं लगा सकते थे। पूर्व मानवसंसाधन मंत्री अर्जुन सिंह ने देश के ख्‍यात शिक्षाविद़ प्रो यशपाल की अध्‍यक्षता में जिस समिति का गठन किया था, उस समिति ने सिब्‍बल के समक्ष अपनी रिपोर्ट पेश की। तुरंत रिपोर्ट को सौ दिनों में लागू करने की घोषणा होते ही देश की उच्‍च शिक्षा को जैसे पंख लग गए। सरकारी स्‍तर पर हो रहे इस प्रयास की मैं सराहना करना चाहूंगा। पहली बार शिक्षा पर व्‍यापक द़ष्टिकोण के साथ सोचा गया है। विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमेन रहने के बाद स्‍वयं यशपाल ने महसूस कर लिया था कि इसकी उपयोगिता नहीं है। देश की उच्‍च शिक्षा को इस समय एक दिशा देने की आवश्‍यकता महसूस हो रही है। केंद्रीय स्‍तर पर एक ही आयोग स्‍थापित करने की सिफारिश कुछ विषमताओं को लिए हो सकती है लेकिन यूजीसी के साथ ही अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद़, चिकित्‍सा शिक्षा परिषद़ और राष्‍टीय अध्‍यापक शिक्षा परिषद़ की उपयोगिता पर सच में चिंतन की आवश्‍यकता है। देशभर में खुल रहे इंजीनियरिंग कॉलेज में गुणवत्‍ता पर अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद़ का कोई नियंत्रण नहीं है। इसी तरह पान की दुकान की तरह खुल रहे बीएड कॉलेज पर अध्‍यापक शिक्षा परिषद़ का कोई हस्‍तक्षेप नहीं दिखता। महज शुल्‍क वसूली करने और हर वर्ष कागजी कार्रवाई नए सिरे से शुरू करने की नीति इन बडे संस्‍थाओं की बन गई है। देश के आईआईटी और आईआईएम को विश्‍वविद्यालय का दर्जा देने की सोच नए माहौल में जरूरी है। यशपाल ने अपनी रिपोर्ट में यहां तक कहा है कि आईआईटी व आईआईएम के साथ ही अन्‍य विश्‍वविद्यालय भी अपना पाठ़यक्रम स्‍वयं तैयार करें और इसकी पुस्‍तकें भी वहीं के व्‍याख्‍याता लिखें। शिक्षा के क्षेत्र में नएपन की जरूरत महसूस हो रही है। यशपाल समिति के बाद दसवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा को समाप्‍त करके सीधे बारहवीं में बोर्ड स्‍थापित करने के प्रस्‍तावों को भी सभी सराह रहे हैं। विद्यार्थियों के दिमाग का बोझ कम होना चाहिए। साथ ही यह ध्‍यान रखना होगा कि विद्यालय स्‍तर पर होने वाली परीक्षाओं का स्‍तर सुधारा जाए।
कुछ दिन पहले अमरीकी राष्‍टपति बराक ओबामा ने अमरीकी युवाओं से कहा था कि वो तकनीकी क्षेत्र में अपना ज्ञान सुधारे नहीं तो भारतीय युवा सभी पर कब्‍जा कर लेंगे। जिस गति से देश में नयापन आ रहा है मैं तो कहूंगा अमरीका ही नहीं संभल जाओ  दुनिया वालो ।
आप क्‍या कहते हैं इससे शिक्षा में सुधार होगा या नहीं?

Tuesday, June 23, 2009

माओवादियों पर पाबंदी

पश्चिम बंगाल में माओवादियों पर रोक का फैसला हो गया। राजनीति को फिर नया पैंतरा मिल गया। अगर कोई यह सोच रहा है कि बंगाल के पीडि़त का दर्द कम होगा तो यह गलत है। हकीकत तो यह है कि मुद़दा बना रहेगा और माओवादी वैसे ही अपना काम करते रहेंगे, गरीब फिर इन्‍हीं के हाथों शोषित होते रहेंगे। पश्चिम बंगाल सरकार ने राजनीति का श्रीगणेश करते हुए इस मुद़दे पर साफ कह दिया है कि इसे अभी लागू करने का विचार नहीं है। ऐसे बयान देने वालों को यह पूछे कि माओवादियों के प्रति उनका रवैया उदारतापूर्ण  क्‍यों है? पश्चिम बंगाल में आज भी ऐसे दर्जनों क्षेत्र है जहां पता नहीं चलता कि देश को आजादी अभी मिली है या नहीं। लोगों को एक बीघा जमीन में बुवाई करने में पसीना कम आ रहा है और उसे संभाल रखने में ज्‍यादा खून बहाना पड़ रहा है। ऐसे खेतों में सिंचाई तो किसान की आंखों के पानी से हो जाती है। यह सोचा ही नहीं जाता कि इन लोगों को भी देश की आजादी का स्‍वाद चखने  का अधिकार है। अगर पश्चिम बंगाल सरकार माओवादी पर अंकुश नहीं लगाना चाहती तो कम से कम ऐसे पीडि़त वर्ग  की रक्षा के लिए तो कुछ करें। पिछले कई दशकों  से  राज्‍य में काबिज वामपंथी अब तक यह निर्णय क्‍यों नहीं कर पाए कि वर्ष 1970 में लगभग खत्‍म हो चुका माओवाद फिर से कदम क्‍यों बढ़ा  रहा है। संसद में लम्‍बी चौड़ी बातें करने वाले वामपंथी नेता अपना विश्‍वास अपने ही घर में खो रहे हैं। महंगाई के मुददे पर चुप रहने वाले वामपंथी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में निलोत्‍पल बसु की बातें सुनकर लगा कि वो अब भी माओवाद के प्रति गंभीर नहीं है। लोकसभा चुनाव की हार के बाद कॉमरेड अब जनता के बीच जाने के बजाय हर बात में ममता एंड पार्टी का विरोध करने में जुटे हैं। बेहतर होगा कि पश्चिम बंगाल के बिगड़े हालात को सुधारे। लोकसभा की हार तो जैसे तैसे पच गई अब बंगाल की हार शायद सहनीय नहीं हो। बेहतर होगा कि बंगाल के हाल सुधारने के लिए वामपंथी स्‍वयं भी सुधरे। माओवाद स्‍वयं वामपंथियों के लिए खतर हो सकता है। 

Tuesday, June 9, 2009

ओम व्‍यास ओम

अरे रामलाल बैठ जा। मुझे पता है यह रामलाल हमारे घनश्‍याम दास का बेटा है। पास वाले बोल रहे हैं कि श्‍याम लाल का बेटा है। इन्‍हें पता नहीं हमें पता है कि दुनिया की नजर में रामलाल श्‍याम लाल का बेटा है और असल में वो घनश्‍यामदास का बेटा है। ...... अगले जो कवि आ रहे हैं उन्‍हें जरा ध्‍यान से सुनना, बहुत एंटीक चीज है, अस्‍सी पार है, अगली बार शायद ही दर्शन हो सके। बीकानेर के रेलवे स्‍टेडियम में करीब पांच वर्ष पहले ओम व्‍यास ओम ने इसी अंदाज में हजारों की भीड़ में अंगुली उठाकर अज्ञात को राम लाल बना दिया। लोग इतने हंसे की कविता से ज्‍यादा उनकी संचालन शैली और शब्‍दों पर लोटपोट हो गए। भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी और वर्तमान में राजस्‍थान में पुलिस अधीक्षक आनन्‍द वदर्धन शुक्‍ला के निकटतम मित्र होने के कारण ओम व्‍यास ओम बीकानेर आए थे। तब भी उनकी मंचीय अदाकारी में मौत और मौत से तमाशा सबसे प्रिय विषय था। वो हर हाल में दर्शक को मंच से हंसाना जानते हैं। वो समझते है कि हजार दुखों पर एक हंसी का फव्‍वारा कितना कारगर होता है। दिल और दिमाग में जब दुनियादारी की फिजूल चिंता भारी हो जाती है तो हंसी ही उस तनाव को हवा कर सकती है। ओम व्‍यास ओम आज भोपाल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं। निश्चित रूप से हजारों लोगों को खुशी का अहसास कराने वालों की दुआ उन्‍हें मौत के जंजाल से खींच कर फिर हमारे बीच लाएगी। ओमप्रकाश आदित्‍य, नीरज पुरी और लाडसिंह के निधन का हम सभी को दुख है। 

Sunday, June 7, 2009

नेता बड़ा या गिरगिट?


अब यह तय होना ही चाहिए कि गिरगिट बड़ा या नेता। निरिह और मूक गिरगिट का लेकर बार बार लोगों को कोसते कोसते जमाना बीत गया और नेता वैसा का वैसा है। मेरे खयाल में गिरगिट से ज्‍यादा रंग बदलना तो इंसान को आता है और उसमें भी इंसान अगर नेता बन गया तो ''करेले पर नीम चढ़ा' जैसा हो जाता है। विश्‍वास नहीं हो तो अपने संगमा सा'ब को देख लीजिए। कांग्रेस में अच्‍छी स्थिति रखने वाले संगमा ने कुछ साल पहले सोनिया गांधी को विदेशी तो कहा ही एक ही परिवार की बपौती बताकर उनका आंगन छोड़ आए थे। सही भी है कांग्रेस में परिवारवाद चल रहा है। पहले नेहरू फिर इंदिरा, फिर राजीव और अब सोनिया शायद आगे राहुल। फिर शादी की तो राहुल के बच्‍चे। संगमा जी ने पार्टी छोड़ते हुए उस खेमे से हाथ मिला लिया, जिन्‍होंने घर की बहु को विदेशी कहा। पिछले दिनों संगमा की अकल की ट़यूबलाइट फिर जल गई। उन्‍होंने सोनिया गांधी से जाकर माफी मांगी कि उन्‍होंने कुछ वर्ष पहले उन्‍हें विदेशी कह दिया था। क्‍या कारण है कि सोनिया पहले विदेशी थी और अब नहीं रही। समझदार जानते है कि संगमा ऐसे ही नहीं बदले। अब खुद संगमा की बेटी अगाथा को मंत्री बना दिया गया और स्‍वयं सोनिया ने उनकी तारीफ कर दी, मीडिया ने जबर्दस्‍त ''हाइक'' दे दी तो संगमा के समझ में आया कि इनसे संबंध अच्‍छे रखने में ही फायदे हैं। इसीलिए पहुंच गए माफी मांगने। अगाथा को देश की सबसे कम उम्र की मंत्री बनाने का श्रेय भी सोनिया को ही है। ऐसे में संगमा ने रंग बदला और कांग्रेस अध्‍यक्ष परिवारवाद की वाहक विदेशी महिला सोनिया से माफी मांगने पहुंच गए। अगर यह माफी बेटी के मंत्री बनने से पहले मांग लेते तो शायद आभास कम होता। खेर रंग कांग्रेस का भी कम बदलने वाला नहीं है ''विदेशी'' कहने वाले तो और भी है लेकिन हाथ सिर्फ संगमा पर ही क्‍यों रखा गया?
वैसे नेताओं के रंग बदलने का यह तो एक नमूना मात्र है। आपके आसपास ऐसे सैकड़ों उदाहरण होंगे जब नेताजी ने कहा कुछ और किया कुछ। दरअसल, इनकी आंख अर्जुन की तरह सिर्फ निशाने पर है और वो लक्ष्‍य है सीट। 

'''तुकबंदी'''

देखो इन नेताओं का कमाल
रखते बस अपनो का खयाल
सारी जनता रोए अपने हाल
बस जीए तो जीए इनके लाल