Wednesday, April 22, 2009

अभिनेता नेता या नेता अभिनेता


कल तक जो साथ थे वो आज अलग है निश्चित रूप से कल फिर लाल बत्ती आती दिखाई दी तो साथ हो जाएंगे। मंच पर बोल रहे हैं कि कांग्रेस भ्रष्ट है और तय है कि सरकार बनती दिखी तो सोनिया महान हो जाएगी, मनमोहन सिंह दुनिया के श्रेष्ठ अर्थशास्त्री हो जाएंगे और राहुल भैया युवा वर्ग की आवाज होंगे। प्रणब मुखर्जी ने भी सही और सही समय पर कहा कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को एक बार फिर सत्ता के लिए साथ आना होगा। आज जो गालियां निकाल रहे हैं, कल उन्हें फिर साथ लेने के लिए यह शुरूआती भूमिका है। समझ में नहीं आता कि इस देश की राजनीति सिर्फ बातों पर क्यों टिकी है, क्यों रामविलास पासवान आसानी से यह कह देते हैँ कि बिहार के मुसलमानों के पास उनके अलावा कोई विकल्प नहीं है, क्यों वरुण गांधी जहर उगल देते हैँ और क्यों लालू प्रसाद उन पर रोड रोलर चलवाने की सार्वजनिक घोषणा कर देते हैं। क्या कारण है कि अर्जुन सिंह को अपनी ही बेटी के खिलाफ प्रचार के लिए उतरना पड़ता है और क्यों इसे महज नाटक मान लिया जाता है। पिछले दिनों राजस्थान पत्रिका में अत्यंत संकलन योग्य समाचार प्रकाशित हुआ कि जिस सीट से कभी डॉ. राजेंद्र प्रसाद चुनाव लड़ा करते थे उस पर शहाबुद्दीन भी जीत गए। अगर यह मतदाता की सोच का दिवालियापन है तो नेता क्या कर रहे हैं? क्या कारण है कि अमेठी के पंद्रह किलोमीटर दायरे से बाहर निकलते ही लालटेन के सहारे रात गुजारते इंसान दिखते हैं, पीने के लिए पानी क्यों तालाब से लाना पड़ता है? देश जिस व्यक्ति को भविष्य का प्रधानमंत्री मानता है उस राहुल गांधी के क्षेत्र में ऐसे हालात क्यों है? शायद राजतंत्र के साथ प्रशासनिक तंत्र भी अपनी जिम्मेदारी भूल गया है। क्या कारण है कि बड़े कद वाले नेता संसद में कुछ भी बोलने के बजाय सिर्फ राजनीतिक पैंतरेबाजी का ही काम करते हैं। पीएम इन वेटिंग माने जा रहे लालकृष्ण आडवाणी के क्षेत्र में क्या कोई परेशानी नहीं है। पिछले पांच वर्ष में उन्होंने संसद में कोई सवाल नहीं करके तो यही साबित किया है कि न सिर्फ उनके क्षेत्र में बल्कि समूचे देश में उनकी नजर में ऐसा कुछ नहीं हुआ जिस पर सवाल उठाया जा सके। क्या कारण है कि सोनिया गांधी ने अपने क्षेत्र के बारे में कुछ नहीं बोला। वो बोली तो सिर्फ परमाणु समझौते को लेकर उठे विवाद पर। कारण साफ है तब सरकार जाती दिखी तो मैडम बोली। हमारे क्षेत्र यानि बीकानेर के सांसद अभिनेता धर्मेंद्र तो इन सबसे दो कदम आगे निकल गए। धर्मेंद बीकानेर आए ही नहीं। पांच साल में उनकी पांच घंटे की यात्रा भी बीकानेर की नहीं रही। हां, सांसद कोटे का धन जरूर खर्च कर दिया। कहां खर्च किया इसका हिसाब तो स्वयं सांसद को भी पता नहीं होगा। अब भाजपा के हाल यह है कि अपने क्षेत्र ही सांसद के बारे में कुछ बोलने तक के लिए तैयार नहीं है। हमारे सांसद ही क्यों अभिनेता गोविन्दा ने भी कुछ ऐसा ही किया। हां जयप्रदा ने अपने मतदाताओं को इतना निराश नहीं किया जितना इन अभिनेताओं ने किया। कारण साफ है कि इन दोनों के पास फिलहाल फिल्में करने के लिए काम है और जयप्रदा के पास शायद फिल्म नहीं है। इस देश की जनता आखिर कब नेता और अभिनेता में अंतर स्पष्ट कर सकेगी। यह सवाल मैंने मेरे दोस्त से किया तो उसने कहा जो नेता दिख रहे हैं क्या वो भी अभिनेता की तरह झूठे नहीं है? सवाल विचारणीय है कि क्या संच में देश में राजनीति कर रहे अभिनेता कुछ महीनों के लिए अपने अपने रोल में नाटक करके, कुछ डॉयलॉग बोलकर हमें गुमराज नहीं कर रहे। इस राजनीति को कब समझेगी इस देश की जनता।