Tuesday, August 25, 2009

इनको कब मिलेगी ''अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता''


नेताओं के बारे में आपका क्‍या विचार है ? कम बोलते हैं या ज्‍यादा बोलते हैं ? आपका जवाब निश्चित रूप से होगा ''बहुत बोलते हैं'', लेकिन क्‍या आपको पता है कि नेता निलम्‍बन के बाद ज्‍यादा तो बोलते ही है सच भी बोलने लगते हैं। पिछले दिनों जसवंत सिंह को पार्टी से‍ निष्‍कासित किया तो वो बहुत जोर जोर से बोलने लगे। बताने लगे कि देश के आतंकियों को कंधार छोड़ने के फैसले में आडवाणी भी शामिल थे। हम तो यह कहते हैं कि आडवाणी के शामिल नहीं होने की बात किसने कही थी। सभी जानते हैं कि उस समय जो भी निर्णय हुआ वो आडवाणी के न सिर्फ ध्‍यान में था बल्कि निर्णय करने वालों में भी वे शामिल थे। जसवंत सिंह अब बोल रहे हैं कि उन्‍होंने प्रधानमंत्री को इस्‍तीफा नहीं देने के लिए मनाया। गुजरात में जो कुछ हुआ, उससे दुखी अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि नरेंद्र मोदी को हटा दिया जाए लेकिन आडवाणी ने हटने नहीं दिया। जसवंत सिंह जी यह बात उस समय बोल जाते तो निश्चित रूप से अब तक ऑपरेशन हो चुका होता। लेकिन तब राष्‍टहित बाद में था और पार्टी हित पहले था। आज जब पार्टी ही नहीं रही तो उसके बारे में कुछ भी बोला जा सकता है। यह तो दोहरापन है। सही और गलत को हर जगह तोलने की हिम्‍मत नेताओं में क्‍यों खत्‍म होती जा रही है। वैसे अरुण शौरी भी अब राग अलापने लगे है। शौरी कह रहे हैं कि राजनाथ सिंह 'हम्‍प्‍टी डम्‍प्‍टी' की तरह है। क्‍या बात है शौरीजी। बहुत देर से पता चला कि राजनाथ क्‍या है ? पार्टी को कटी पतंग कहने वाले शौरी को मानना होगा कि इसी पतंग को एक दो 'हिचके' उन्‍होंने भी दिए हैं। वो मानते हैं कि राजनाथ सिंह पार्टी को सही तरीके से संचालित नहीं कर रहे। संभव है कि भाजपा के वर्तमान दौर में शौरी की बात सही है। यह भी सही है कि राजस्‍थान की मुख्‍यमंत्री रही वसुंधरा राजे को जिस बेकद्री से हटाया जा रहा है, वो न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ता बल्कि आम जनता के लिए भी दुखद साबित हो रहा है। खंडूरी को हटाने के पूर्व निर्णय की आलोचना भी शौरी ने अब की है। अच्‍छी बात है कि शौरी कुछ बोले तो सही। अब वसुंधरा प्रकरण भी समाप्‍त होने वाला है और खंडूरी वाला मामला तो कब का निपट चुका। इस मामले में भी शौरी सार्वजनिक रूप से बहुत देरी से बोले। न सिर्फ भाजपा बल्‍िक कांग्रेस में भी ऐसे ही हालात है। यह कहें तो गलत नहीं होगा कि भाजपा से ज्‍यादा रोक कांग्रेस में है। वहां पार्टी से हटकर जो बोला है सब न सिर्फ पार्टी के बल्कि राजनीति के हाशिये पर चले गए। शरद पंवार अपने बूते पर राजनीति में कायम है, लेकिन कांग्रेस ने उन्‍हें दरकिनार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नटवर सिंह इससे भी बड़ा उदाहरण है जो न सिर्फ देश की बल्कि राजस्‍थान की राजनीति से भी साफ हो चुके हैं। बड़े बेआबरू होकर पार्टी से बाहर गए। अगर हिसाब किताब सही होता तो नटवर सिंह के ऐसे हाल नहीं होते। नजमा हेपतुल्‍ला की स्थिति से भी स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस में कितना लोकतंत्र बाकी रह गया है। विचारधारा का राग अलापने वाली वामपंथी पार्टियों ने दो कदम आगे बढ़ाते हुए सोमनाथ चटर्जी को ''किक आउट'' कर दिया क्‍योंकि उन्‍होंने अपने राजधर्म को पार्टी धर्म से बड़ा मान लिया था।
मेरा मानना है कि अभिव्‍यक्ति की जिस स्‍वतंत्रता का राग संसद में आए दिन अलापा जाता है वो स्‍वयं नेताओं के पास नहीं है। इन नेताओं को सिर्फ और सिर्फ पार्टी की लाइन पर बोल सकते हैं। जो हिम्‍मत कर लेता है वो बेचारा कीमत चुकाता ही है।