Friday, October 9, 2009

क्‍या देश में सेना की कमी है



देश के प्रमुख हिन्‍दी दैनिक 'पत्रिका' के सम्‍पादकीय पेज पर आमतौर पर फोटो प्रकाशित नहीं होता। कल का संपादकीय में चार कॉलम में एक फोटो छपा। नीचे लिखे केप्‍शन ने फोटो की अहमियत का अहसास करा दिया। मन को बहुत दुख हुआ कि आजाद भारत में एक पुलिस कर्मी को तरह मौत के घाट उतारा जा सकता है और जनता तमाशबीन होकर देख भी रही है। फ्रांसिस इंदूवार की हत्‍या के  बाद पुलिस होश संभालती उससे पहले गढ़चिरौली में इंदूवार जैसे 18 और पुलिसकर्मी शहीद हो गए। पाकिस्‍तान को तीन बार धूल चंटाने वाला भारत, दुनिया की नई शक्ति के रूप में उभर रहे इंडिया और अपने अभिमान के लिए सब कुछ न्‍यौछावर करने वाले हिन्‍दूस्‍तान की क्‍या यही दशा देखनी शेष रह गई है। आखिर क्‍या कारण है कि हम नक्‍सलवाद से निपट ही नहीं पा रहे हैं। मायोवादी क्‍या भारतीय सेना से अधिक मजबूत, शक्तिशाली और निर्णयक्षमता वाले हो गए कि हम कमजोर साबित हो रहे हैं। हमारी सरकारी व्‍यवस्‍था का आलम तो यह है कि इंदूवार अपनी जान हथैली पर लेकर नक्‍सलवाद से लड़ रहा था और उसका सरकारी कार्यालय पांच माह पहले तबादले का कागज नहीं पहुंचने के कारण वेतन के लिए परिजनों को चक्‍कर कटा रहा था। हमारी सारी शक्ति इसी काम में लग रही है कि कैसे किसी काम को टाल दिया जाए। इंदूवार के वेतन से लेकर मायोवादियों का खात्‍मा करने के निर्णय तक के बीच ऐसे ही हालात हमें कमजोर साबित कर रहे हैं। महाराष्‍ट़ के जिस क्षेत्र में माओवादियों ने कब्‍जा किया है, वहां क्‍या भारतीय सेना नहीं पहुंच सकती। जब श्रीलंका लिट़टे जैसे संगठन को नेस्‍तनाबूद कर सकती है तो क्‍या हम  इतने भी सक्षम नहीं है। दुख की बात है कि हमारे गृह मंत्री अब भी वार्ता की बात कर रहे हैं। क्‍या हमारी वार्ता इतनी मजबूती से होगी कि माओवादी हथियार डाल देंगे। हम बार बार मामले को टालने के लिए वार्ता और शांति की बात क्‍यों करते हैं ? जब देश के कानून में एक व्‍यक्ति की हत्‍या की सजा मौत है तो सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतारने वालों के साथ वार्ता कैसी?

Wednesday, September 16, 2009

चीन को चांटा क्‍यों नहीं ?


आज राजस्‍थान पत्रिका के प्रथम पृष्‍ठ पर एक कार्टून छपा है। बहुत ही शानदार। बताया गया है कि एक तरफ प्रधानमंत्री जी ऑफिस से बाहर निकल रहे हैं और पास ही खड़े कार्टून आइकन कहते हैं ''अब कुछ करोगे भी या सिर्फ बोलते रहेंगे''। चीन की घुसपैठ के मामले में मुझे यह सटायर सही समय पर लगाया गया शॉट है। आखिर क्‍या कारण है कि हमारी सरकारें सिर्फ बोलने का काम करती है। बयान देने में हम सबसे आगे हैं और करने में सबसे पीछे। मुझे करगिल युद्ध का समय याद आता है। मेरे शहर बीकानेर से पाकिस्‍तान की सीमा काफी सटी हुई है। करगिल युद्ध के वक्‍त बीकानेर में सेना का डेरा था, हर तरफ हथियार, गोला बारूद देखकर लगा कि अब तक सीमा पर आरपार की लड़ाई होने वाली है। पाकिस्‍तान को एक बार फिर छठी या सातवीं का दूध याद आ जाएगा। हम लोग भी युद्ध की तैयारी में जुटे हुए थे। इस बीच एक साधारण से जवान से बातचीत करने पहुंच गए। उससे पूछा कि युद्ध में जा रहे हो, कहीं डर तो नहीं लग रहा। उसने तुरंत कहा, ''हां, डर लग रहा है।'' मैंने उसे धिक्‍कारते हुए कहा कि डर ही लग रहा है तो यहां क्‍यों बैठे हो। घर जाओ। उसने कहा ''यही तो डर लग रहा है कि लड़ने के लिए इतनी दूर आए हैं। कहीं प्रधानमंत्रीजी वापस लौटने के लिए नहीं कह दे। हालात ऐसे नहीं थे कि वापस लौटने जैसी स्थिति हो। पहाड़ों में चुनौती दे रहे पाकिस्‍तान को धोरों की धरती से मात देने की तैयारी कुछ दिन बाद ही बंद हो गई। युद्ध नहीं हुआ। सिर्फ मशक्‍कत हुई, बातें हुई और सैनिकों को इधर से उधर चक्‍कर काटने पड़े। न सिर्फ करगिल के वक्‍त बल्कि संसद पर हमले सहित अनेक मामलों में भी सेना हरकत में आती है लेकिन कोई हरकत करती नहीं है। उस जवान से बात करने के बाद लगा कि उसकी बाजू तो फड़क रही है लेकिन सरकार उस पर पाबंदी लगाए हुए हैं। अगर चीन हमारी जमीन पर कब्‍जा कर रहा है, खुद ही आगे बढ़ता जा रहा है तो हमें कार्रवाई करने के लिए क्‍या अमरीका से अनुमति लेनी होगी। हम क्‍यों अपने बचाव के लिए खुद कुछ नहीं करते। धीरे धीरे चीन आगे बढ़ता जाएगा और हम शांति शांति की रट लगाए रहेंगे। आज युद्ध आसान नहीं है, बहुत गंभीर मसला है लेकिन युद्ध न सही, उचित प्रतिउत्‍तर तो दे ही सकते हैं। कभी पाकिस्‍तान, कभी चीन, कभी नेपाल, कभी बांग्‍लादेश। सभी पड़ौसी देश मौका मिलने पर भारत से छेडखानी करने से नहीं डरते। क्‍या हम चीन में इतनी मजबूती से जवाब नहीं दे सकते कि छोटे प्‍यादे तो सुनकर ही किनारे हो जाए। हमारी सेना के हाथ बांधने के बजाय पाकिस्‍तान व चीन को जवाब देने की तैयारी होनी चाहिए। अतिक्रमण करने से पहले चीन ने किसी से पूछा नहीं था, विदेश नीति का भी ध्‍यान नहीं रखा था। फिर हम उनका ध्‍यान क्‍यों रख रहे हैं।
कहां घुसा है चीन
उत्‍तरी सिक्किम के कैरंग सहित अनेक क्षेत्रों में घुसपैठ । पाकिस्‍तान दो किलोमीटर लंबे फिंगर टिप क्षेत्र पर कब्‍जा करने की कोशिश में
क्‍या किया चीनी सेना ने
भारतीय जवानों पर गोलियां चलाई। दो जवान घायल।
क्‍या है नियम
नियमानुसार गोलीबारी करना अनुचित है। अगर भारत से कोई शिकायत है तो संबंधित माध्‍यम से ही यह
सूचना की जा सकती थी।

Sunday, September 6, 2009

अरे, सुधर जा पाकिस्‍तान


पिछले कुछ दिनों से पाकिस्‍तान के बारे में कुछ न कुछ पढ़ने को मिल रहा है। एक दिन पढ़ने में आया कि भारत से एक नाव पाकिस्‍तान में चली गई तो पाक सैनिकों ने काफी मेहनत करके भारतीय नाव को न सिर्फ बचाया बल्कि उसमें बैठे करीब तीन दर्जन लोगों को सही सलामत ससम्‍मान वापस भारत के हवाले भी किया। मन को सुकून मिला कि पाकिस्‍तान के साथ ऐसे रिश्‍ते कितने अच्‍छे होते हैं। इस बीच एक खबर आई कि पाकिस्‍तान ने अपने हथियारों की दिशा को भारत की तरफ कर दिया। सोचा कि यह तो रोज की खबर है कोई चिंता की बात नहीं। आज फिर यही बात समाचार पत्रों में प्रमुखता से है कि पाक के एटमी इरादे खतरनाक हो रहे हैं। इस बार अमेरीकी कांग्रेस की ताजा रिपोर्ट भारत के लिए चिंता का कारण बनी है। पाकिस्‍तान अपने परमाणु शस्‍त्रों की गुणवत्‍ता और संख्‍या बढ़ाने में लगा हुआ है। कांग्रेशनल रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक इस्‍लामाबाद के शस्‍त्रागार में लगभग साठ परमाणु बम है और जरूरत पड़ने पर इनकी संख्‍या बढ़ जाएगी। हालांकि रिपोर्ट पर संदेह का मजबूत कारण यह है कि पिछले सप्‍ताह ही यह संख्‍या सौ बता दी गई थी। पाकिस्‍तान के शस्‍त्रागार में भले ही कितने ही परमाणु हो, मुद़दा यह है कि पाकिस्‍तान बार बार इस मामले में हलचल क्‍यों करता है? क्‍या कारण है कि पाकिस्‍तान और भारत के बीच किसी न किसी मामले को लेकर अनबन बनी ही रहती है। दो अच्‍छे पड़ौसी का मन मुटाव होता है और न चाहते हुए भी इस तरह के विवाद उठते हैं तो एक दिन स्थिति विस्‍फोटक बन ही जाती है। अगर भारत और पाकिस्‍तान के बीच ऐसे हालात बने तो निश्चित रूप से स्थिति अत्‍यंत विस्‍फोटक होगी। सीमावर्ती क्षेत्र में रहने के कारण मैं युद़ध नहीं बल्कि इसकी तैयारी मात्र की कल्‍पना से 'भयभीत' हो जाता हूं। सोचता हूं कि दुनिया के नक्‍शे से यह देश साफ हो जाएगा। पाकिस्‍तान का नाम लेने वाला कोई नहीं रहेगा। मैंने करगिल और इसके बाद हाल ही में वार की आशंका मात्र पर बनी परिस्थितियों को नजदीक से देखा है।
चिंता पाकिस्‍तान में भी कम नहीं है
''पाकिस्‍तानंस न्‍यूक्लियर वेपन्‍स - प्रोफेशनल एंड सिक्‍योरिटी इश्‍यू'' शीर्षक वाली रिपोर्ट में पाकिस्‍तान की चिंता भी साफ दिखाई देती है। पाकिस्‍तान को भय है कि भारत की नई शस्‍त्र प्रणाली पाकिस्‍तान के लिए काफी घातक साबित हो सकती है। पाकिस्‍तानी विदेश मंत्रालय ने भी इस मामले में काफी गंभीरता से टिप्‍पणी की है। यानि दोनों तरफ हालात एक जैसे हैं और दोनों तरफ से अगर कहीं भी गड़बड़ हुई तो चिंता हो जाएगी।
पाक के लिए शस्‍त्र के बजाय अर्थ की चिंता जरूरी
वैसे पाकिस्‍तान की ही एक रिपोर्ट में वहां की आर्थिक स्थिति के बारे में समीक्षा की गई है। जो काफी चिंताजनक है। पाकिस्‍तान को वर्तमान परिस्थितियों में अपने शस्‍त्रगारों की चिंता छोड़कर अपने देश की आर्थिक स्थिति पर चिंतन और मनन करना चाहिए। सोचना चाहिए कि युवाओं को किस तरह दुनिया से जोड़ा जाए। किस तरह देश की आर्थिक स्थिति को सुधारा जाए। मैं एक बार फिर कहना चाहूंगा कि पाकिस्‍तानियों में कोई गड़बड़ नहीं है, वहां के लोग अच्‍छे हैं, मैं छह दिन तक उनके साथ एक ही कमरे में रहा हूं, गड़बड़ है तो पाकिस्‍तानी नेताओं के दिमाग में। मेरे साथ नेपाल में रहे पाकिस्‍तानी पत्रकार शोएब भी मानता था कि पाकिस्‍तानी नेता ही देश का कबाड़ा करने में जुटे हुए हैं।
पाकिस्‍तानी नेताओं की ओर से शस्‍त्रों की सार संभाल पर अंत में एक ही बात कहूंगा
इनसे न तलवार उठेगी, न खंजर। ये बाजू हमारे आजमाए हुए हैं।

Wednesday, September 2, 2009

धन्‍यवाद ब्‍लॉगर साथियों


'ये ब्‍लॉग पर पाठक कब आएंगे' मेरी कल की पोस्‍ट पर रिकार्ड तोड़ पाठकों के आगमन और बेहिसाब (वैसे 32) टिप्‍पणियों के लिए आप सभी का आभार। आप एक बार फिर इस पोस्‍ट पर जाएं और देखें कि टिप्‍पणी करने वाले 32 पाठकों में ब्‍लॉगर कितने हैं और पाठक कितने? यह भी सही है कि स्‍वयं ब्‍लॉगर सबसे बड़ा पाठक है लेकिन हकीकत यह है कि ब्‍लॉगर के अलावा पाठक जब तक नहीं आएंगे तब तक हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत को आगे ले जाना मुश्किल होगा। इसके लिए प्रयास होना चाहिए। अधिकांश टिप्‍पणियों से यह प्रतीत हुआ कि मेरे ब्‍लॉग पर पाठक नहीं आ रहे। काफी हद तक यह सही है कि लेकिन मेरा चिंतन अपने ब्‍लॉग तक सीमित नहीं है। मुझे अपेक्षा थी कि तमाम साथी हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत से लोगों को जोड़ने के लिए कुछ सुझाव देंगे। अधिकांश ने यही कहा कि लिखते रहिए पाठक अपने आप आएगा। लगातार लिखने वाला और बेहतर लिखने वाले के पास पाठक आ रहे हैं। समीरजी, आशीषजी, अविनाश वाचस्पति, सिद्धार्थजी, प्रवीणजी, बी एस पाबला , अलबेलाजी AlbelaKhatri.com वर्षाजी varsha इसके उदाहरण है। अगर आप गुगल विश्‍लेषण में देखेंगे तो पता चलेगा कि आपकी पोस्‍ट पर वही पाठक आ रहा है जो पिछले लम्‍बे अर्से से आपसे जुड़ा हुआ है। नए पाठक बहुत कम है। मेरा चिंतन है कि कुछ ऐसा होना चाहिए कि ब्‍लॉग पर नियमित रूप से लोग आएं। जिस व्‍यक्ति के पास इंटरनेट कनेक्‍शन है वो ब्‍लॉग की दुनिया में दस्‍तक जरूर दें। विशेषकर हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत पर उसका आगमन हो। हम अपने आसपास के ही साथियों को देखेंगे तो पता चलेगा कि ब्‍लॉग के बारे में जानकारी नहीं है। क्‍यों नहीं हम ब्‍लॉग पर इस तरह का नवाचार करें कि सच में पढ़ने वाला पाठक उस पर आए। मेरी चिंता में इस तथ्‍य को भी शामिल किया जाए कि चालीस पार कर चुके अधिकांश लेखक और पाठक ब्‍लॉग से दूर है क्‍योंकि कम्‍प्‍यूटर उनके लिए बहुत टेडी खीर है। हम ऐसे लेखकों को कम्‍प्‍यूटर सीखने के लिए प्रेरित करें और उनकी रचना को पोस्‍ट करने में सहायता करें। मेरे साथी सिद्वार्थ यह काम कर रहे हैं। मेरे जैसे एक दो नहीं बल्कि पांच सात लोगों को उसने ब्‍लॉग को बुखार चढ़ाया। अगर हम सब मिलकर दो चार लोगों को ही इस दुनिया में लाने का प्रयास करेंगे तो यह सपना सच होगा।
विज्ञापन क्‍यों नहीं
पुराना राग है फिर भी अलाप देता हूं कि हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के आगे नहीं बढ़ने का एक कारण इसमें विज्ञापन नहीं होना भी प्रतीत होता है। क्‍या कारण है कि दुनियाभर में भारतीय विद्यार्थी कम्‍प्‍यूटर तकनीक में डंका बजा रहे हैं और हमारे ही ब्‍लॉग विज्ञापन से वंचित है। क्‍यों गुगल हिन्‍दी ब्‍लॉग को अछूत मानकर विज्ञापन से किनारे कर देता है। क्‍या ऐसा कोई ब्‍लॉग माध्‍यम विकसित नहीं हो सकता, जिससे कि हिन्‍दी के ब्‍लॉगर भी विज्ञापन प्राप्‍त कर सकें। इस दिशा में सभी को मिलकर सोचना होगा। मुझे नहीं पता कि हिन्‍दी ब्‍लॉगर से गुगल को या अन्‍य किसी 'गल' को कितना लाभ हो रहा है, लेकिन इतना स्‍पष्‍ट है कि नुकसान बिल्‍कुल नहीं है।
फिर से धन्‍यवाद कि आप मेरे ब्‍लॉग पर पधारे। मेरे ऊपर आप सभी की कृपा हुई। आभार। संभव हो तो इस बारे में सुझाव अवश्‍य दें कि आगे क्‍या कर सकते हैं। मैं समीरजी को विश्‍वास दिलाता हूं कि बीकानेर से इसकी शुरूआत जरूर होगी। हम जल्‍दी ही बीकानेर में एक कार्यशाला आयोजित करने जा रहे हैं जिसमें युवा वर्ग को ब्‍लॉग के बारे में जानकारी दी जाएगी। शायद यह प्रयास कुछ सार्थक हो।

Tuesday, September 1, 2009

ये ब्‍लॉग पर पाठक कब आएंगे?


पिछले कुछ समय से सोच रहा हूं कि आखिर ब्‍लॉग पर पाठक आने कब शुरू होंगे ? वर्तमान में तो ब्‍लॉग पर लेखक ज्‍यादा है पाठक कम। मैं पिछले एक वर्ष से ब्‍लॉग लिखकर मन की भड़ास निकाल रहा हूं। इस एक वर्ष में मैंने ब्‍लॉग पर आ रहे आलेखों और पाठकों की प्रतिक्रियाओं को देखकर अपना आकलन किया है। संभव है कि यह आकलन पूरी तरह सतही हो लेकिन वाल्‍तेयर के पद चिन्‍हों पर चलते हुए अभिव्‍यक्ति की अपनी स्‍वतंत्रता को कायम रखते हुए कहना चाहूंगा। हिन्‍दी ब्‍लॉग पर अब तक पाठकों के आने का सिलसिला शुरू ही नहीं हुआ। जो लोग सिर्फ पढ़ने के लिए आ रहे हैं, वो या तो बड़े ब्‍लाग जैसे कि अमिताभ बच्‍चन का बिग अड़डा पर ही आ रहे हैं। कुछ आलोचक व समालोचक के पाठक जरूर आ रहे हैं लेकिन शेष के लिए हम ही पाठक है और हम ही लेखक। एक दूसरे की हौंसला अफजाई और ब्‍लॉग के बारे में पढ़ने और उसे संवारने की कवायद ज्‍यादा है। जो ब्‍लॉगर किसी के ब्‍लॉग में नयापन देने के लिए कुछ न कुछ लिंक दे रहे हैं, उनके पाठक भी ज्‍यादा है और फॉलोवर भी। आशीषजी का ब्‍लॉग इसका उदाहरण है। निसंदेह उन्‍होंने और उनके जैसे दूसरे मित्रों ने सभी ब्‍लॉगर्स को हुलिया सुधारने और सलीके से ब्‍लॉग बनाना सिखाया है। कुछ ब्‍लॉग नौटंकी जैसे भी है, जिन पर मैटर के नाम पर कुछ नहीं है, हंसी मजाक जरूर है। हां हिन्‍दी चैनल मीडिया से जुड़े कुछ पत्रकारों के ब्‍लॉग जरूर पठनीय होते हैं। उनमें न सिर्फ विचार है बल्कि जानकारियों का खजाना भी है। अधिकांश ब्‍लॉगर नियमित लेखन के बजाय कुछ मैटर हाथ लगने पर अपनी भड़ास निकाल देते हैं, जी हां, ठीक मेरी तरह। अगर आप ब्‍लॉग दुनिया के बारे में कुछ लिख रहे हैं तो पाठक खूब आ जाएंगे क्‍योंकि स्‍वयं ब्‍लॉगर ही उसे पढ़ते हैं। यह मुझे तब पता चला जब मैंने पिछले दिनों आशीष जी को बिन मांगी नसीहत दे डाली। इतनी संख्‍या में लोग पहुचेंगे, यह मुझे ज्ञात नहीं था। इसके बाद पिछली तीन पोस्‍ट भाजपा पर लिखी लेकिन रेस्‍पोंस बहुत कमजोर नहीं, नगण्‍य है। मैंने सोचा कि यह मेरी लेखनी की कमजोरी है कि लोग मेरे ब्‍लॉग पर नहीं आ रहे। बाद में दूसरे लेखकों के ब्‍लॉग भी देखने शुरू किए। मैं यहां किसी के नाम का उल्‍लेख नहीं कर रहा लेकिन आप अपनी किसी गंभीर पोस्‍ट के पाठकों के बारे में विश्‍लेषण प्राप्‍त करें। पता चलेगा कि उन पर पाठक सबसे कम आए हैं। मुझे लगता है जिस गति से हम ब्‍लॉग पर पोस्‍ट डाल रहे हैं, उसी गति से इसके स्‍तर में सुधार के साथ साथ पाठकों की संख्‍या में वृद्वि करनी होगी। कई बार पढ़ता हूं कि ब्‍लॉगर्स मीट का आयोजन होता है। ऐसी मीट के बजाय हम आम लोगों को ब्‍लॉग के बारे में जानकारी दे ताकि लोग कुछ पढ़ने के लिए ब्‍लॉग पर क्लिक करें। विशेषकर उन लोगों को जानकारी देनी चाहिए, जो इंटरनेट पर तो रोज बैठते है लेकिन ब्‍लॉग नहीं देखते। मैंने यह भी महसूस किया है कि प्रमुख लेखक अब भी ब्‍लॉग पर अपना आलेख नहीं देते। इसका एक कारण तो वरिष्‍ठ लेखकों, चिंतकों व समालोचकों को नेट का कम ज्ञान हो सकता है दूसरा इस ब्‍लॉग दुनिया के प्रति उनकी अरुचि। मेरे शहर बीकानेर में ही डॉ नन्‍दकिशोर आचार्य, हरीश भादाणी, मालचंद तिवाड़ी, अनिरुद्व उमट सहित ऐसे दर्जनभर लोग हैं, जिन्‍हें पढ़ने की चाहत है लेकिन ब्‍लॉग की जानकारी नहीं। जो ब्‍लॉग रेटिंग तय कर रहे हैं, उन्‍हें भी विषय वार रेटिंग देनी चाहिए। खेल पर किसने अच्‍छा लिखा, साहित्‍य पर किसने बाजी मारी, समसा‍मयिक विषयों पर किसकी कलम तीखी रही। इससे अच्‍छे पाठकों को जोड़ने में सफलता मिल सकती है। ऐसे लोगों को ब्‍लॉग पर जोड़ने के लिए प्रयास होने चाहिए। भले ही उनसे अनुमति लेकर कोई भी आलेख को अपने ब्‍लॉग पर देना शुरू करें। अंत में कहना चाहूंगा कि ब्‍लॉगवाणी में जो रेटिंग आ रही है उसमें प्रथम दस ब्‍लॉग की सामग्री देखकर सभी यह चिंतन करें कि कैसे ब्‍लॉग की दुनिया को नया मोड़ दिया जा सकता है।

Saturday, August 29, 2009

बीजेपी यानि भारतीय ''झगड़ा'' पार्टी


वक्‍त गुजारने का भी अपना एक अंदाज होता है। कोई गीत गाकर, कोई टहल कर, कोई सिगरेट पीकर, कोई नींद लेकर, कोई किताब पढ़कर, कोई हंसी मजाक करके और कोई कोई तो झगड़ा करके वक्‍त गुजारता है। यहां दिए सभी उदाहरणों से आप सहमत होंगे लेकिन एक 'झगड़े' वाले से नहीं। अगर आप भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान हालत पर नजर डालेंगे तो यह भी सच ही प्रतीत होगा। बीजेपी का अर्थ इन दिनों भारतीय 'जनता' पार्टी नहीं है बल्कि भारतीय 'झगड़ा' पार्टी हो रहा है। पिछले दिनों राजस्‍थान में वसुंधरा राजे को प्रतिपक्ष नेता हटाने की कवायद के साथ साबित हो गया था कि पार्टी अब बड़े संघर्ष के लिए तैयार हो रही है। जिस वसुंधरा राजे ने भाजपा को पहली बार प्रदेश में स्‍पष्‍ट बहुमत दिलाया और आज मुख्‍यमंत्री नहीं होते हुए भी आम राजस्‍थानी में लोकप्रिय है, उसी वसुंधरा को उखाड़ने की कवायद शुरू की गई। मामला दिल्‍ली पहुंचा तो पता चला कि वहां राष्‍टीय अध्‍यक्ष स्‍वयं विवादों में उलझे हुए हैं। एक दो दिन बाद वसुंधरा के विरोधी माने जाने वाले जसवंत सिंह ही चलते बने। जिन्‍ना पुराण उन्‍हें ले डूबा। अभी जसवंत का मामला निपटा ही नहीं कि राष्‍टीय स्‍वयंसेवक संघ ने नई बहस छेड़ दी। यह बहस भाजपा के शीर्ष के साथ जड़ तक को हिलाने वाली है। इस बार अटल बिहारी वाजपेयी के बाद भाजपा के दूसरे मुखौटे लालकृष्‍ण आडवाणी को ही चलता करने की रणनीति सामने आई। आडवाणी को प्रतिपक्ष नेता पद से हटाने की कवायद शुरू हो गई। राष्‍टीय स्‍वयंसेवक संघ के सरसंघचालक ने आडवाणी को सलाह दी या आदेश यह तो पार्टी की नीति रीति के निर्माता ही बता सकते हैं लेकिन हकीकत सिर्फ इतनी है कि भाजपा बहुत ही बुरी स्थिति में पहुंच गई है। एक वर्ग तो राजनाथ सिंह को ही अलविदा करने की तैयारी में जुटा है। क्‍या भाजपा के सारे ''बटन'' बदल जाएंगे। वैसे भी नए स्‍वरूप में आना बहुत आसान नहीं होता। अगर पार्टी अपने स्‍वरूप में ही परिवर्तन लाने के दौर से गुजर रही है तो अगले लोकसभा चुनाव तक बहुत कुछ सुधर सकता है और अगर यह पार्टी के वरिष्‍ठ नेताओं की आपसी खींचतान है तो अगले चुनाव तक भाजपा भी जनता दल की तरह दल दल तक पहुंच जाएगी। वर्तमान में पार्टी जड़ से शीर्ष तक अस्‍त व्‍यस्‍त है, ऐसे में अभी टुकड़े हुए तो कोई संभालने वाला नहीं मिलेगा। अवसर भी नहीं रहेगा। कभी अरूण शोरी तो कभी खडूरी जैसे नेता पार्टी को खूंटी पर टांग देते हैं।
इस दौर में राजस्‍थान की पूर्व मुख्‍यमंत्री वसुंधरा राजे ने हालांकि पार्टी बनाने की अटकलों पर यह कहते हुए विराम लगा दिया कि भाजपा उनकी मां की तरह है। अगर राजे नई पार्टी बना लेती तो निश्चित रूप से राजस्‍थान में भाजपा तीसरे नम्‍बर पर लुढ़क जाती। आज भी वसुंधरा आम आदमी के दिलों दिमाग पर छाई हुई है। राजस्‍थान में संभाग मुख्‍यालयों पर चार घंटे बिजली कटौती हो रही है, लाइट गुल होते ही आम आदमी एक ही बात कहता है ''फेर दो कोंग्रेस ने बोट'। कर्मचारी आज भी वसुंधरा के कायल है। भाजपा के अस्‍सी फीसदी विधायक उनके साथ है, ऐसे में उन्‍हें ही प्रतिपक्ष नेता से हटाना हजम नहीं हो रहा। इस मामले में केंद्र पर गंभीरता से चिंतन हो रहा था लेकिन अब स्‍वयं उनकी जमीन हिल गई तो कोई राजे के बारे में क्‍या सोचे? वैसे मामला सिर्फ केंद्र और राज्‍य स्‍तर तक ही सीमित नहीं है कोई गंभीरता से चिंतन करें तो आम कार्यकर्ता तक असंतुष्‍ट है।
आडवाणी कार्टून - बीबीसी से साभार

Tuesday, August 25, 2009

इनको कब मिलेगी ''अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता''


नेताओं के बारे में आपका क्‍या विचार है ? कम बोलते हैं या ज्‍यादा बोलते हैं ? आपका जवाब निश्चित रूप से होगा ''बहुत बोलते हैं'', लेकिन क्‍या आपको पता है कि नेता निलम्‍बन के बाद ज्‍यादा तो बोलते ही है सच भी बोलने लगते हैं। पिछले दिनों जसवंत सिंह को पार्टी से‍ निष्‍कासित किया तो वो बहुत जोर जोर से बोलने लगे। बताने लगे कि देश के आतंकियों को कंधार छोड़ने के फैसले में आडवाणी भी शामिल थे। हम तो यह कहते हैं कि आडवाणी के शामिल नहीं होने की बात किसने कही थी। सभी जानते हैं कि उस समय जो भी निर्णय हुआ वो आडवाणी के न सिर्फ ध्‍यान में था बल्कि निर्णय करने वालों में भी वे शामिल थे। जसवंत सिंह अब बोल रहे हैं कि उन्‍होंने प्रधानमंत्री को इस्‍तीफा नहीं देने के लिए मनाया। गुजरात में जो कुछ हुआ, उससे दुखी अटल बिहारी वाजपेयी चाहते थे कि नरेंद्र मोदी को हटा दिया जाए लेकिन आडवाणी ने हटने नहीं दिया। जसवंत सिंह जी यह बात उस समय बोल जाते तो निश्चित रूप से अब तक ऑपरेशन हो चुका होता। लेकिन तब राष्‍टहित बाद में था और पार्टी हित पहले था। आज जब पार्टी ही नहीं रही तो उसके बारे में कुछ भी बोला जा सकता है। यह तो दोहरापन है। सही और गलत को हर जगह तोलने की हिम्‍मत नेताओं में क्‍यों खत्‍म होती जा रही है। वैसे अरुण शौरी भी अब राग अलापने लगे है। शौरी कह रहे हैं कि राजनाथ सिंह 'हम्‍प्‍टी डम्‍प्‍टी' की तरह है। क्‍या बात है शौरीजी। बहुत देर से पता चला कि राजनाथ क्‍या है ? पार्टी को कटी पतंग कहने वाले शौरी को मानना होगा कि इसी पतंग को एक दो 'हिचके' उन्‍होंने भी दिए हैं। वो मानते हैं कि राजनाथ सिंह पार्टी को सही तरीके से संचालित नहीं कर रहे। संभव है कि भाजपा के वर्तमान दौर में शौरी की बात सही है। यह भी सही है कि राजस्‍थान की मुख्‍यमंत्री रही वसुंधरा राजे को जिस बेकद्री से हटाया जा रहा है, वो न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ता बल्कि आम जनता के लिए भी दुखद साबित हो रहा है। खंडूरी को हटाने के पूर्व निर्णय की आलोचना भी शौरी ने अब की है। अच्‍छी बात है कि शौरी कुछ बोले तो सही। अब वसुंधरा प्रकरण भी समाप्‍त होने वाला है और खंडूरी वाला मामला तो कब का निपट चुका। इस मामले में भी शौरी सार्वजनिक रूप से बहुत देरी से बोले। न सिर्फ भाजपा बल्‍िक कांग्रेस में भी ऐसे ही हालात है। यह कहें तो गलत नहीं होगा कि भाजपा से ज्‍यादा रोक कांग्रेस में है। वहां पार्टी से हटकर जो बोला है सब न सिर्फ पार्टी के बल्कि राजनीति के हाशिये पर चले गए। शरद पंवार अपने बूते पर राजनीति में कायम है, लेकिन कांग्रेस ने उन्‍हें दरकिनार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नटवर सिंह इससे भी बड़ा उदाहरण है जो न सिर्फ देश की बल्कि राजस्‍थान की राजनीति से भी साफ हो चुके हैं। बड़े बेआबरू होकर पार्टी से बाहर गए। अगर हिसाब किताब सही होता तो नटवर सिंह के ऐसे हाल नहीं होते। नजमा हेपतुल्‍ला की स्थिति से भी स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस में कितना लोकतंत्र बाकी रह गया है। विचारधारा का राग अलापने वाली वामपंथी पार्टियों ने दो कदम आगे बढ़ाते हुए सोमनाथ चटर्जी को ''किक आउट'' कर दिया क्‍योंकि उन्‍होंने अपने राजधर्म को पार्टी धर्म से बड़ा मान लिया था।
मेरा मानना है कि अभिव्‍यक्ति की जिस स्‍वतंत्रता का राग संसद में आए दिन अलापा जाता है वो स्‍वयं नेताओं के पास नहीं है। इन नेताओं को सिर्फ और सिर्फ पार्टी की लाइन पर बोल सकते हैं। जो हिम्‍मत कर लेता है वो बेचारा कीमत चुकाता ही है।

Thursday, August 20, 2009

भारतीय जिन्‍ना पार्टी


भारतीय जनता पार्टी का नाम एक बार फिर बदलता दिखा। भारतीय जनता पार्टी से भारतीय जिन्‍ना पार्टी। नाम नहीं बदले इसलिए पार्टी ने जिन्‍ना का गुणगान करने वाले जसवन्‍त सिंह को ही बाहर निकाल दिया। जसवंत सिंह ने अपनी किताब में जिन्‍ना के बारे में नहीं लिखा है बल्कि पूरी किताब ही जिन्‍ना को समर्पित कर दी है। इस पुस्‍तक में जिन्‍ना का जितना गुणगान किया गया, वो प्रत्‍येक भारतीय के लिए आपत्तिजनक है। होना भी चाहिए। हम आज रावण को दशहरे पर अग्नि के हवाले क्‍यों करते हैं। रावण तो बहुत ही विद्वान व्‍यक्ति था। उसने बहुत सामाजिक कार्य किए थे लेकिन सीता माता के प्रति उसकी गलत सोच ही उससे नफरत का कारण बनी। जिन्‍ना बहुत अच्‍छे इंसान रहे होंगे लेकिन अपनी ही मां का गला काटकर उसके दो टुकड़े कर देने वाले को माफ नहीं किया जा सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि वो अच्‍छा इंसान था। एक गलती तो सदियों की तपस्‍या को भंग कर देती है, फिर जिन्‍ना की गलती तो सदियों को भुगतनी पड़ेगी। हजारों परिवारों ने भुगती भी है। जसवंत सिंह ने कहा है कि देश के विभाजन के लिए जिन्‍ना नहीं बल्‍िक जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल जिम्‍मेदार थे। जसवंत सिंह जी यह बताएं कि भारतीय जनता पार्टी का राज आने पर अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाया गया, एक खेमा लालकृष्‍ण आडवाणी को चाहता था। आडवाणी नहीं बन पाए तो क्‍या वो अलग देश के प्रधानमंत्री बन जाएंगे ? यह संभव है कि प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में जवाहर लाल नेहरू और जिन्‍ना दोनों का दावा हो सकता है। यह भी संभव है कि नेहरू ने दबाव बनाया हो। यह तो राजनीति है, उसका जवाब भी राजनीतिक होना चाहिए। राजनीति में बहुत कुछ गलत हो रहा है, आज स्‍तर गिर गया लेकिन क्‍या किसी राज्‍य के नेता ने यह कहा कि मुझे मुख्‍यमंत्री नहीं बना रहे तो अलग राज्‍य बना दो। जिन्‍ना ने तो देश ही दूसरा बना दिया। जसवंत सिंह तो देश की गुलामी के वक्‍त के हैं, उन्‍हें तो यह पता ही होगा कि देशभर में कहीं से यह मांग नहीं उठी कि पाकिस्‍तान बनाओ। इस देश के मुसलमान नहीं चाहते थे कि विभाजन हो। इस देश के मुसलमान नहीं चाहते थे कि उन्‍हें अलग किया जाए। इस देश के मुसलमान अपने लिए अलग से नरक बनाने का सपना संजाऐ नहीं बैठे थे। यही कारण है कि आज भी पाकिस्‍तान से ज्‍यादा मुसलमान हिन्‍दूस्‍तान में रहते हैं। बासठ साल बाद भी हिन्‍दूस्‍तान के मुसलमान पाकिस्‍तान जाना तो दूर उस तरफ मुंह नहीं करना चाहते। ऐसे में अपनी महत्‍वाकांक्षा पूरी करने के लिए जिन्‍ना ने जो कुछ किया, वो उसकी सौ तो क्‍या हजार खूबियों पर पानी फेरने के लिए काफी है।
जसवंत सिंह को पार्टी से निष्‍कासित करना उचित है या गलत ? यह तो जवाब पार्टी दे लेकिन हम तो इतना कहते हैं कि हिन्‍दूस्‍तान में जिन्‍ना पूजा उचित नहीं है। महज देशभर में चर्चा बने रहने के लिए ऐसा करना अनुचित है। हां इतना जरूर कहेंग कि पार्टी में दोहरी नीति है, जिसने जिन्‍ना की मजार पर जाकर तारीफों के पुल बांधे उन्‍हें कुछ नहीं कहा गया और जो यहीं बैठे किताबें लिख रहे हैं, उन्‍हें पार्टी से निकाल दिया। खैर मर्जी है उनकी, क्‍योंकि पार्टी है उनकी।

Monday, August 17, 2009

आशीषजी, नए ब्‍लॉगर को संघर्ष करना पड़ता है

आशीषजी का ब्‍लॉग पढ़ने के बाद पहले तो उन्‍हें कमेंट देने का मन किया, फिर सोचा अपन भी एक पोस्‍ट ही रगड़ देते हैं। शायद कुछ कमेंट अपने को भी मिल जाए। आपने जिस ब्‍लॉगर साथी की धज्जियां उड़ाई है, उनका नाम पता मुझे नहीं पता क्‍योंकि मेरा मेल पता सार्वजनिक नहीं है। फिर भी उसका मेल आता तो मैं सहजता से पढ़ता और एक टिप्‍पणी भी करता। टिप्‍पणी यह भी हो सकती थी कि आपका पोस्‍ट अभी मेहनत मांगता है, आपका पोस्‍ट बेहतर है, आपको अपने ब्‍लॉग में और बेहतर तरीके से काम करना चाहिए। आपको मेल करने के बजाय अपनी लेखनी में इतना दम लाना चाहिए कि लोग खुद पढ़े। जी हां ठीक वैसे ही जैसे आशीष जी के आलेख पढ़े जाते हैं, उनके आज 540 फोलोवर है। मैं पत्रकारिता के पेशे से जुड़ा हुआ हूं इसलिए समझता हूं कि लोग स्‍वयं को स्‍थापित करने के लिए क्‍या क्‍या करते हैं। बहुत संघर्ष करना पड़ता है। विशेषकर लेखक और साहित्‍य की दुनिया में स्‍वयं को स्‍थापित करना बहुत मुश्किल है। समाचार पत्रों में अब साहित्‍य के लिए इतना स्‍थान नहीं है कि हर बार एक नए लेखक को प्रकाशित करें। नतीजतन पुराने और प्रतिष्ठित लेखक को ही स्‍थान मिल पाता है। वैसे भी प्रतिस्‍पर्द्वा के इस युग में यही संभव है। ऐसे में नए लेखक ब्‍लॉग की तरफ जुड रहे हैं। वो अपनी लेखनी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं। बताना चाहते हैं कि उन्‍होंने लिखा है, देखें कैसा लिखा है। यह नहीं कहा जाता कि सकारात्‍मक टिप्‍पणी ही दें। सभी चाहते हैं कि उसके पास अधिक से अधिक पाठक आएं। मैं अपने ब्‍लॉग पर अलग अलग विषयों पर लिखता हूं। मेरा अध्‍ययन है संभव है कि गलत हो, कि शिक्षा सहित अनेक गंभीर मुद़दों पर लोग पढ़ना ही नहीं चाहते। आज पाकिस्‍तान के बारे में कुछ लिखता हूं तो खूब पढ़ने वाले आते हैं। मैंने दुनिया भर के देशों की सूची दी तो बहुत कम लोग आए लेकिन अमरीका पाकिस्‍तान का जिक्र किया तो काफी पाठक आए। यह पाठक के स्‍वभाव पर निर्भर है। हर कोई चाहेगा कि उसे ज्‍यादा से ज्‍यादा लोग पढ़े। एक बार तो पढ़े फिर पसंद नहीं आए तो दोबारा भले ही उस तरफ मुंह न करें। जैसे कि आपने अपनी पोस्‍ट के ठीक नीचे ही सदस्‍य बनने के लिए आग्रह किया है। निसंदेह आपका ब्‍लॉग ही ऐसा है कि लोग खींचे चले आते हैं, आपकी जानकारी हर किसी को न सिर्फ प्रभावित करने वाली है बल्कि लाभदायी भी है। फिर भी आशीष जी आपको मानना होगा कि नया ब्‍लॉगर स्‍वयं के आलेख को सब के सामने पहुंचाने के लिए कुछ प्रयास करता है। जितनी मेहनत से ''उस'' साथी ने ईमेल एकत्र करके अपनी सूचना पहुंचाने का उपक्रम किया, उतनी ही गति से आपने उसका पत्‍ता साफ कर दिया। नि-संदेह जिन लोगों के पास उक्‍त पोस्‍ट पहुंची सभी ने उस लेखक को तो बेकार मान ही लिया होगा। मेरा मानना है कि इस देश में लता मंगेशकर तो एक ही है क्‍योंकि वो ही इस मंच तक पहुंच सकी, लेकिन उनसे भी बेहतर गाने वाली और भी होगी जो अपने घर में ही मंदिर के आगे बैठकर भजन ही करती है। हम लता मंगेशकर का सम्‍मान तो करें लेकिन भजन गा रही सामान्‍य गायिका का अपमान तो नहीं करें। बेहतर होता कि आप सभी इमेल पते देने और ब्‍लॉगर का नाम हटाने आदि का उपक्रम करने के बजाय अलग से एक पोस्‍ट देते कि एक साथ सैकड़ों लोगों को पोस्‍ट करने से क्‍या नुकसान है, क्‍या फायदें हैं।
मैंने शुद्व मन से लिखने का प्रयास किया है। उम्‍मीद है आप अन्‍यथा नहीं लेंगे।

Thursday, August 13, 2009

अमरीका फिर पाक के साथ


आखिर दुनिया की क्‍या मजबूरी है कि वो अमरीका की बकवास को सुनता है। चलो दुनिया की छोड़ो हम तो घर की बात करते हैं। अमरीका में ऐसा क्‍या है जो हम उसकी बात न सिर्फ सुनने के लिए बल्कि मानने के लिए भी मजबूर हो जाते हैं। अब पिछले दिनों शर्म अल शेख की घटना को ध्‍यान में रखें तो खुद ही शर्मसार हो जाते हैं। अमरीका ने पाकिस्‍तान को हजार बार चेतावनी दे दी कि वो आतंकवाद से किनारा करें नहीं तो अमरीका उसे सहायता बंद कर देगा। इस बीच अपनी चिर परिचित शैली में एक बार फिर अमरीका ने साफ कर दिया कि वो पाकिस्‍तान को सहायता देता रहेगा। इस बार तो दो कदम आगे बढ़कर अमरीकी मंत्रालय ने स्‍पष्‍ट किया है कि दोनों देशों के बीच बने संबंध एक दो वर्षों के लिए नहीं है, बल्कि अर्से तक निभाने के लिए हैं। सही है दोनों एक दूसरे के मौसी के बेटे जो ठहरे। भारतीय अर्थ व्‍यवस्‍था, भारतीय विदेश नीति, भारतीय सांस्‍कृतिक नीति और तो और भारत की रक्षा नीति में कहीं भी पाकिस्‍तान सौ कदम से कम पीछे नहीं है। जब हम हर मामले में पाकिस्‍तान से सौ कदम आगे हैं तो हमें किसी अन्‍य देश की बात मानने की जरूरत ही क्‍या है? हम क्‍यों बार बार उससे बातचीत करते हैं ? दुनिया में जो देश तेज गति से आगे बढ़ रहा है वो भारत है। यह न सिर्फ मैं कह रहा हूं बल्कि स्‍वयं अमरीका भी मानने लगा है। जापान और चीन को भी आभास हो चुका है कि जिस गति से भारत आगे आ रहा है, उससे अधिक गति स्‍वयं अमरीका की नहीं है। यह आभास दूसरे देशों के नेताओं को हो रहा है लेकिन हमारे नेताओं को नहीं। पहले आडवाणीजी पाकिस्‍तान में जाकर जिन्‍ना की मजार पर भावुक हो गए और अब मनमोहनजी अपनी ही बात से हटकर शर्म अल शेख में बेशर्म हो गए। अभी मामला ठण्‍डा ही नहीं हुआ कि अमरीका ने सदा के लिए दोस्‍ती का वायदा करके साफ कर दिया कि भारतीय नेताओं के भरोसे विकास का पहिया रुकता जाएगा।

Wednesday, July 29, 2009

दुनिया के देश

दुनिया के सभी देशों की सूची उनकी राजधानियों के नाम के साथ मिली है। आपके लिए भी यह सूची उपलब्‍ध करा रहा हूं।
Afghanistan - Kabul
Albania - Tirane
Algeria - Algiers
Andorra - Andorra la Vella
Angola - Luanda
Antigua and Barbuda - Saint John's
Argentina - Buenos Aires
Armenia - Yerevan
Australia - Canberra
Austria - Vienna
Azerbaijan - Baku
The Bahamas - Nassau
Bahrain - Manama
Bangladesh - Dhaka
Barbados - Bridgetown
Belarus - Minsk
Belgium - Brussels
Belize - Belmopan
Benin - Porto-Novo
Bhutan - Thimphu
Bolivia - La Paz (administrative); Sucre (judicial)
Bosnia and Herzegovina - Sarajevo
Botswana - Gaborone
Brazil - Brasilia
Brunei - Bandar Seri Begawan
Bulgaria - Sofia
Burkina Faso - Ouagadougou
Burundi - Bujumbura
Cambodia - Phnom Penh
Cameroon - Yaounde
Canada - Ottawa
Cape Verde - Praia
Central African Republic - Bangui
Chad - N'Djamena
Chile - Santiago
China - Beijing
Colombia - Bogota
Comoros - Moroni
Congo, Republic of the - Brazzaville
Congo, Democratic Republic of the - Kinshasa
Costa Rica - San Jose
Cote d'Ivoire - Yamoussoukro (official); Abidjan (de facto)
Croatia - Zagreb
Cuba - Havana
Cyprus - Nicosia
Czech Republic - Prague
Denmark - Copenhagen
Djibouti - Djibouti
Dominica - Roseau
Dominican Republic - Santo Domingo
East Timor (Timor-Leste) - Dili
Ecuador - Quito
Egypt - Cairo
El Salvador - San Salvador
Equatorial Guinea - Malabo
Eritrea - Asmara
Estonia - Tallinn
Ethiopia - Addis Ababa
Fiji - Suva
Finland - Helsinki
France - Paris
Gabon - Libreville
The Gambia - Banjul
Georgia - Tbilisi
Germany - Berlin
Ghana - Accra
Greece - Athens
Grenada - Saint George's
Guatemala - Guatemala City
Guinea - Conakry
Guinea-Bissau - Bissau
Guyana - Georgetown
Haiti - Port-au-Prince
Honduras - Tegucigalpa
Hungary - Budapest
Iceland - Reykjavik
India - New Delhi
Indonesia - Jakarta
Iran - Tehran
Iraq - Baghdad
Ireland - Dublin
Israel - Jerusalem*
Italy - Rome
Jamaica - Kingston
Japan - Tokyo
Jordan - Amman
Kazakhstan - Astana
Kenya - Nairobi
Kiribati - Tarawa Atoll
Korea, North - Pyongyang
Korea, South - Seoul
Kosovo - Pristina
Kuwait - Kuwait City
Kyrgyzstan - Bishkek
Laos - Vientiane
Latvia - Riga
Lebanon - Beirut
Lesotho - Maseru
Liberia - Monrovia
Libya - Tripoli
Liechtenstein - Vaduz
Lithuania - Vilnius
Luxembourg - Luxembourg
Macedonia - Skopje
Madagascar - Antananarivo
Malawi - Lilongwe
Malaysia - Kuala Lumpur
Maldives - Male
Mali - Bamako
Malta - Valletta
Marshall Islands - Majuro
Mauritania - Nouakchott
Mauritius - Port Louis
Mexico - Mexico City
Micronesia, Federated States of - Palikir
Moldova - Chisinau
Monaco - Monaco
Mongolia - Ulaanbaatar
Montenegro - Podgorica
Morocco - Rabat
Mozambique - Maputo
Myanmar (Burma) - Rangoon (Yangon); Naypyidaw or Nay Pyi Taw (administrative)
Namibia - Windhoek
Nauru - no official capital; government offices in Yaren District
Nepal - Kathmandu
Netherlands - Amsterdam; The Hague (seat of government)
New Zealand - Wellington
Nicaragua - Managua
Niger - Niamey
Nigeria - Abuja
Norway - Oslo
Oman - Muscat
Pakistan - Islamabad
Palau - Melekeok
Panama - Panama City
Papua New Guinea - Port Moresby
Paraguay - Asuncion
Peru - Lima
Philippines - Manila
Poland - Warsaw
Portugal - Lisbon
Qatar - Doha
Romania - Bucharest
Russia - Moscow
Rwanda - Kigali
Saint Kitts and Nevis - Basseterre
Saint Lucia - Castries
Saint Vincent and the Grenadines - Kingstown
Samoa - Apia
San Marino - San Marino
Sao Tome and Principe - Sao Tome
Saudi Arabia - Riyadh
Senegal - Dakar
Serbia - Belgrade
Seychelles - Victoria
Sierra Leone - Freetown
Singapore - Singapore
Slovakia - Bratislava
Slovenia - Ljubljana
Solomon Islands - Honiara
Somalia - Mogadishu
South Africa - Pretoria (administrative); Cape Town (legislative); Bloemfontein (judiciary)
Spain - Madrid
Sri Lanka - Colombo; Sri Jayewardenepura Kotte (legislative)
Sudan - Khartoum
Suriname - Paramaribo
Swaziland - Mbabane
Sweden - Stockholm
Switzerland - Bern
Syria - Damascus
Taiwan - Taipei
Tajikistan - Dushanbe
Tanzania - Dar es Salaam; Dodoma (legislative)
Thailand - Bangkok
Togo - Lome
Tonga - Nuku'alofa
Trinidad and Tobago - Port-of-Spain
Tunisia - Tunis
Turkey - Ankara
Turkmenistan - Ashgabat
Tuvalu - Vaiaku village, Funafuti province
Uganda - Kampala
Ukraine - Kyiv
United Arab Emirates - Abu Dhabi
United Kingdom - London
United States of America - Washington D.C.
Uruguay - Montevideo
Uzbekistan - Tashkent
Vanuatu - Port-Vila
Vatican City (Holy See) - Vatican City
Venezuela - Caracas
Vietnam - Hanoi
Yemen - Sanaa
Zambia - Lusaka
Zimbabwe - Harare

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