Thursday, August 9, 2012

बाबा से उम्‍मीद की मजबूरी

बाबा रामदेव पिछले कुछ दिनों से फिर चर्चा में है। पहले बाबा रामदेव, फिर अन्‍ना हजारे। बाबा औरतों के कपड़े पहनकर मैदान से भाग गए थे और बाबा रामदेव राजनीति को विकल्‍प बताते हुए अपनी ही टीम को भंग कर चुके हैं। इसके बाद भी भारतीय जन और जनतंत्र की मजबूरी है कि इन लोगों पर भरोसा करना पड़ेगा। दरअसल, बाबा और अन्‍ना ने जिन विषयों के आधार पर जनता की नब्‍ज पकड़ी है, वो सटीक है। भ्रष्‍टाचार और काला धन वापस लाने का अभियान देश की आजादी का दूसरा अभियान कहा जा सकता है। इसके बाद भी यह सोचने की जरूरत है कि आखिर क्‍या इस मुहिम के बाद देश दोबारा आजाद हो सकेगा। दरअसल, रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर भीड़ के रूप में खड़े होने वाले चेहरों से ही सब कुछ नहीं बदलने वाला। बदलने के लिए तो आम जन में विश्‍वास जगाना पड़ेगा। फिलहाल बाबा और अन्‍ना जो कर रहे हैं वो सड़क पर तमाशा दिखाने वालों के पास एकत्र होने वाली भीड़ जैसा है। तमाशा वाला जान जोखिम में डालकर कई करतब दिखाता है तो हम उनकी गरीबी और करतब की गंभीरता को देखते हुए एक या दो रुपए उसकी झोली में डाल देते हैं। जैसे ही करतब से हटते हैं, उस गरीब के बारे में सोचना बंद कर देते हैं। ठीक वैसे ही हम अन्‍ना और बाबा के आंदोलन से एंटरटेनमेंट महसूस कर रहे हैं। पिछले डेढ़ वर्ष में आखिर किस शख्‍स ने भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लड़ने की तैयारी की है।
बाबा रामदेव ने साफ कर दिया कि वो राजनीतिक पार्टी में रुचि नहीं रखते ऐसे में उन्‍हें साफ करना होगा कि उनके आंदोलन का चरण क्‍या होगा। यह भी बताना होगा कि अगर सरकार उनके अनशन और आंदोलन से नहीं मानेगी (जिसकी शत प्रतिशत उम्‍मीद है) तो वो क्‍या करेंगे। दस दिन का खेल दिखाकर आश्रम जाएंगे या फिर सरकार खदेड़ेगी तो लड़कियों के कपड़े पहनकर भाग निकलेंगे। अगर नहीं तो आखिर किस तरह उनका आंदोलन चलेगा। दरअसल, जनता जिन लोगों पर विश्‍वास करना शुरू करती है, वो ही बाद में धोखा दे जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे अन्‍ना ने पिछले दिनों दिया। जनता से दो दिन में एसएमएस करने की राय पूछी, हजारों लोगों ने छह छह रुपए के एसएमएस टीवी चैनलों और स्‍वयं अन्‍ना को किए लेकिन उसका विश्‍लेषण करने से पहले ही टीम अन्‍ना अन्‍ना पार्टी बन गई। जब पार्टी बनानी ही थी तो लोगों के एसएमएस क्‍यों खराब करवाए। इसी तरह बाबा रामदेव भी कुछ करेंगे, ऐसी आशंका से इनकार करने का कारण नहीं है। बाबा रामदेव को अपने आंदोलन का हर चरण्‍ा स्‍पष्‍ट करना होगा। हार हुई तो ऐसे, जीत हुई तो ऐसे करेंगे। देश की आजादी डेढ़ साल में नहीं मिली थी। एक शतक वर्ष में जाकर यह सपना पूरा हो पाया। वो भी तब जब अंग्रेज इस देश से हार चुके थे, छोड़ना चाहते थे। इसके विपरीत जिस दूसरी आजादी की बात कर रहे हैं, वहां भ्रष्‍ट नेता न तो अंग्रेजों की तरह छोड़ना चाह रहे हैं और न उनके लिए कोई विपरीत स्थिति बन पाई है। ऐसे में आंदोलन में बार बार होने वाली हार तो सहन हो सकती है लेकिन अन्‍ना की तरह मैदान छोड़कर भागने की नीति अब भारत की जनता शायद सहन नहीं कर पाए।
आंदोलन में अंतर
अन्‍ना और बाबा रामदेव के आंदोलन में एक बड़ा अंतर है। वो यह कि अन्‍ना के पास अपनी एक टीम है और वो लगभग पूरे देश में सक्रिय है। ऐसे में बाबा का नेटवर्क बड़ा और सुव्‍यवस्थित है। इसके विपरीत अन्‍ना के पास अपनी टीम के अलावा कोई कसावटभरा नेटवर्क नहीं था। इसी कारण उन्‍हें कम भीड़ और बाद में उपेक्षा जैसी सच्‍चाई से सामना करना पड़ा। बाबा रामदेव को यह समस्‍या नहीं है। देश के अधिकांश हिस्‍सों से उनके एक इशारे पर हजारों लोग पहुंच सकते हैं। अगर उनके आंदोलन में सच्‍चाई रही तो दूसरे लोग भी उनसे जुड़ेंगे और आंदोलन को सफलता की राह पर ले जाएंगे।
सरकार नहीं है गंभीर
अन्‍न की तरह बाबा के आंदोलन को लेकर भी केंद्र सरकार गंभीर नहीं दिख रही। दरअसल, अन्‍ना के विफल आंदोलन के बाद सरकार के हौंसले बुलंद है और उन्‍हें लगता है कि बाबा रामदेव भी आठ दस दिन बाद अपने आप चले जाएंगे। ऐसे में आंदोलन लम्‍बा चल सकता है जिसके लिए बाबा टीम को तैयार रहना चाहिए।
परिणाम मिलना जरूरी नहीं
बाबा को यह सोचकर भी आंदोलन नहीं करना चाहिए कि उन्‍हें शत प्रतिशत परिणाम इस बार ही मिल जाएगा। निश्चित रूप से इसमें विलम्‍ब हो सकता है लेकिन तब तक के लिए इंतजार करना चाहिए। आंदोलन को पहले चरण में ही साफ कर दिया जाना चाहिए कि अगर मांगे नहीं मानी गई तो फलां तारीख से यह निर्णय होगा।