Saturday, August 4, 2012

क्‍या टीम अन्‍ना हार गई ?

अन्‍ना हजारे ने सोलह महीने पहले जो आंदोलन किया था, उसका अंत हो गया या फिर दूसरा चरण शुरू हो गया है। मेरा मानना है कि आंदोलन का दूसरा चरण शुरू हो गया है। इसका आशय यह कतई नहीं है कि मैं पहले चरण को सफल मान रहा हूं। मेरा मानना है कि पहले चरण की विफलता के बाद दूसरे चरण में संभावना तलाशी जा रही है। ऐसा स्‍वयं अन्‍ना और उनकी टीम भी स्‍वीकार कर चुकी है कि वो पहले चरण में हारने के बाद अब दूसरे चरण में प्रवेश कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब पहला चरण हार ही गए तो दूसरे चरण की जरूरत ही क्‍या है। अन्‍ना अपने राणेगाव सिद्वि में काम संभालें और अरविन्‍द अपने कर विभाग को सेवाएं दें। जहां तक संभव हो लड़े। बाकी सदस्‍य भी अपना रास्‍ता नापें। दरअसल, इस आंदोलन को लेकर देशभर में भारतीय भावनाएं जागी थी। दरअसल, अन्‍ना ने अपने गांव और महाराष्‍ट में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अच्‍छा काम किया था। इसलिए उम्‍मीद जगी थी कि वो कुछ अच्‍छा कर देंगे। देश ने उनमें गांधी जैसा साहस और लाल बहादुर शास्‍त्री जैसा अटल विश्‍वास देखा था। संभव है कि वो आज भी कायम है लेकिन उनकी टीम इस विश्‍वास पर खरी नहीं उतरी। यह तो मानना ही होगा कि अच्‍छी टीम का चयन करना उनके लिए संभव नहीं था। कुमार विश्‍वास सहित कई युवा चेहरे अच्‍छे हैं लेकिन राजनीति के पचड़े से काफी दूर। कई ऐसे लोग भी है जो एनजीओ में काम करते हुए तथाकथित ईमानदार है। शब्‍दों के चयन में माहिर इन लोगों के भरोसे न तो देश वोट कर सकता है और न राजनीतिक दावपेंच में वो सफल हो सकते हैं। बेहतर होता कि अन्‍ना अपना आंदोलन जारी रखते। भले ही दस बार ओर उन्‍हें बिना किसी परिणाम के अनशन से उठना पड़ता। महात्‍मा गांधी भी तो कई बार बिना निर्णय के ही अनशन से उठे होंगे। जरूरी नहीं था कि सरकार उनके सामने झुकती। जनता ने तो सजदा किया ही था। अन्‍ना के आंदोलन की तुलना जेपी के आंदोलन से की गई। यहां यह समझने का प्रयास करना होगा कि जेपी के आंदोलन की मियाद कितनी थी। अन्‍ना की तरह महज सोलह महीने में खत्‍म नहीं हो गया था या फिर अपना इरादा नहीं बदल दिया था। जेपी के आंदोलन से निकले नेता भी आज साफ नहीं है, उन पर भी दाग है। एक लम्‍बे संघर्ष के बाद नि‍कले नेता शरद यादव, परिवारवाद के नए चेहरे मुलायम सिंह यादव और चारा किंग लालू प्रसाद यादव ने जेपी की विचारधारा की हवा निकाल दी। नीतिश्‍ा कुमार कुछ हद तक सफल है लेकिन कोयले की खान में बेदाग वो भी नहीं रह सके। इसी तरह कैसे मान लिया जाए कि राजनीति में आने के बाद अन्‍ना की टीम के सदस्‍य भी बेदाग रह पाएंगे। वो भी तब जब उन पर आरोप लगने का सिलसिला पहले ही शुरू हो चुका है।
अन्‍ना को एक बार‍ फिर विचार करना चाहिए। अभी वक्‍त बाकी है। पार्टी का गठन नहीं हुआ है। एक समान सत्‍ता खड़ा करने का तरीका सिर्फ राजनीति में आना नहीं है बल्कि अपने दम पर भीड़ एकत्र करना भी है। अन्‍ना जंतर मंतर पर उस सामान्‍य भीड़ को देखकर शायद हताश हो गए लेकिन हकीकत में भ्रष्‍टाचार के मुद़दे पर पूरा देश उनके साथ है। वोट देने के लिए शायद नहीं। जब लोकसभा चुनाव आएगा तो मेरे शहर के लोग इस लिए वोट नहीं करेंगे कि वो ईमानदार है या बेईमान। वो तो इसलिए मतदान करेंगे कि सामने वाला कौनसी जात का है। इस सत्‍य से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। अगर टीम अन्‍ना भी इसी आधार पर टिकटों का वितरण करते हुए ईमानदार लोगों को सामने लाएगी तो कहा जाएगा कि जातिवाद को स्‍वीकार कर टीम अन्‍ना आगे बढ़ी है। किसी भी रास्‍ते से टीम अन्‍ना का राजनीति में आना उचित नहीं है। मुझे तो स्‍तम्‍भकारों का यह प्रश्‍न भी सही लगता है कि टीम अन्‍ना सत्‍याग्रह कर रही थी या फिर दूराग्रह। अगर यह सत्‍याग्रह था तो इसका परिणाम यह नहीं होना चाहिए था। अन्‍ना आपसे देश उम्‍मीद कर रहा है, प्रधानमंत्री बनने की नहीं, देश को सुधारने की।