Sunday, June 7, 2015

क्या अकेली मैगी ही दो मिनट में निपटनी थी

पिछले बीस वर्ष में मैंने पहली बार किसी सरकार को खाद्य सामग्री पर इस तरह कार्रवाई करते देखा है। खाद्य सामग्री तो दूर दुखदायी दवाओं पर भी इतनी सख्ती से कार्रवाई नहीं होती, जितनी मैगी पर हुई है। आश्चर्य इस बात का है कि मैगी बनाने वाली नैस्ले ने 'दो मिनटÓ भी अपनी शुद्धता के लिए संघर्ष नहीं किया। जैसे ही केंद्र सरकार ने इसे देशभर के लिए प्रतिबंधित किया, वैसे ही नेस्ले के अधिकारियों ने एक प्रेस कांफ्रेस करके बाय बाय  बोल दिया। कुछ तो गड़बड़ थी, तभी नेस्ले ने इतनी जल्दी हार स्वीकार कर ली। खैर इस सख्त कार्रवाई के लिए केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को साधुवाद। नैस्ले की मैगी देश के बच्चों के लिए स्वास्थ्यकारक थी या फिर हानिकारक, इससे अब कोई सरोकार नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि विदेशी कंपनी ने भारत में जो एकाधिकार कर रखा था, उस पर सख्ती से रोक लग गई। जो नूडल्स नेस्ले बना रही है, वो मैगी है लेकिन जो हमारी मां बना रही है वो सेवईयां है। सेवईयां का नाम मैगी करके बाजार में प्रोफेशनल तरीके से पेश करने का गुण नेस्ले के पास था। हमारी मां कटोरी के छेद से जो सेवईयां बनाती है, वैसा स्वाद मैगी में आ ही नहीं सकता। अब महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि मैगी की तरह ही देश में और भी बहुत कुछ बिक रहा है, जिस पर सवालियां निशान है। उसकी जांच क्यों नहीं हो रही है। खासकर शीतल पेय की जांच होनी चाहिए, जिसने देश में करोड़ों अरबों रुपए का व्यापार फैला रखा है और हमारी भारतीय कंपनियों को पछाड़ दिया है। विज्ञापन के दम पर बिक रही कोका कोला, पेप्सी और अन्य शीतल पेय में मिलाई जा रही सामग्री की जांच होनी चाहिए। क्या यह शीतल पेय पीने से देशवासियों के स्वास्थ्य को सुधारा जा रहा है, क्या इससे देशवासियों के स्वास्थ्य को कोई नुकसान नहीं हो रहा है। स्वदेशी आंदोलन चला रहे देशवासी बार बार इन शीतल पेय पर रोक लगाने की मांग कर चुके हैं लेकिन उनकी आवाज दब जाती है। इसके अलावा भी बच्चों के खाने के बहुत सारे उत्पाद बाजार में है। जिसमें कई देशी है और कई विदेशी। इतना ही नहीं कई तरह की टॉफियां, चॉकलेट और आइसक्रीम भी बाजार में है। इनकी भी एक एक करके जांच होनी चाहिए। विदेशी के साथ देशी उत्पादों की भी जांच होनी चाहिए। हमारे बच्चे चिप्स खाना भूल गए लेकिन लेयज उन्हें हर हाल में चाहिए। आलू चिप्स कभी घर पर भी बना करते थे, सस्ते भी और स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाने वाले भी। इसके बाद भी बाजार में बीस से चालीस रुपए में मुट्ठीभर चिप्स देने वाली कंपनी की जांच होनी चाहिए। न सिर्फ गुणवत्ता की बल्कि उसकी कीमत का भी आकलन होना चाहिए। कंपनियों को पता है कि बच्चों के जिद के आगे माता-पिता मजबूर हैं, और उन्हें पांच रुपए की चीज चालीस रुपए में देने में  कोई दिक्कत नहीं है। इन कंपनियों का प्रचार इतना ज्यादा है कि शुद्धता के साथ सामान बेचने की इच्छा रखने वालों को बाजार में टिकने ही नहीं दिया जाता। सरकार को चाहिए कि वो हर खाद्य सामग्री की जांच करे और गलत मिलने पर उस पर रोक लगाए।