बात से मन हल्‍का होता है

Wednesday, March 11, 2009

मुशर्रफ को पडे दो थप्‍पड

कोई आपके घर में आपके ही परिवार को तोडने का प्रयास करें तो आप क्‍या करेंगे। निश्चित रूप से आरती तो नहीं उतारेंगे, अति हुई तो थप्‍पड जरूर लगा देंगे। पिछले दिनों पाकिस्‍तान के पूर्व तानाशाह और स्‍वयं को राष्‍टपति बताने वाले परवेज मुशर्रफ इंडिया टूडे के कान्‍क्‍वलेव में आए। आए भी क्‍या इस बदमिजाज को बुलाया गया। खाली बैठे सेवानिवृत को कामकाज था नहीं, इसलिए भारत आ गए। यहां आकर इस शख्‍स अपना असली चेहरा दिखा दिया। यह भी बता दिया कि बन्‍दर बुढा होने पर भी गुलाटी खाना नहीं भूलता, कुत्‍ता बुढा होने पर भी भौंकना नहीं छोडता और मुशर्रफ कुछ भी नहीं होने के बाद भी पाकिस्‍तान से भारत रिश्‍ते खराब करने की फितरत नहीं छोडता। विशेषकर मुर्शरफ ने कहा कि भारत में रहने वाले मुसलमानों के साथ अच्‍छा व्‍यवहार नहीं होता, भारत के मुसलमान तकलीफ में है, भारत में इसी‍लिए मुस्लिम में कटटरपंथी बढ रहे हैं और आतंकवादी घटनाएं बढ रही है। यह तो शुक्र है कि वहां मदनी जैसे सांसद उपस्थित थे, जिन्‍होंने भारत को जीया है, जो सच्‍चे भारतीय है। मदनी ने उस खुर्राट, बदमिजाज तानाशाह को ऐसा जवाब दिया कि मुशर्रफ बगले झांकने लगे। मदनी ने साफ कहा कि आप भारत में रह रहे मुसलमानों की चिंता छोड दें, हम पाकिस्‍तान से अधिक है और अपनी हिफाजत करना चाहते हैं, मदनी ने बता दिया कि यह देश उनका है, किसी धर्म का नहीं। सही भी है भारत में हिन्‍दू मुसलमान एक है, अपनी समस्‍या अपने झगडे हैं, पाकिस्‍तान को इससे क्‍या लेना देना। दो भाई लडे या प्रेम करे, पडौसी क्‍या लेनदेन। फिर ऐसे पडौसी को तो चिंता करनी ही नहीं चाहिए, जिनके घर से फूटे बर्तन हर रोज सडकों पर आकर गिरते हो। बेहतर होगा मुशर्रफ को मदनी जी की सलाह मान लेनी चाहिए और अपने घर का ध्‍यान रखना चाहिए। पिछली कुछ घटनाओं के बाद तो लगने लगा है कि पाकिस्‍तान का नामोनिशान ही खत्‍म होने वाला है। जिस तरह के गह युद़ध के हालात वहां बने हैं उससे हम सीमावर्ती (पाकिस्‍तान से महज डेढ सौ किलोमीटर की दूरी पर) रहने वालों को डर लग रहा है कि टूटा तो हमारे यहां भी कोई शरणार्थी पहुंच जाएगा। मुशर्रफ को एक और थप्‍पड पडा था जब उन्‍होंने दाऊद इब्राहिम को देने पर भी भारत में शांति नहीं होने की बात कही। एक 'भारतीय' ने कहा आप तो दाऊद को सौंप दें, बाकि हम देख लेंगे।  वैसे मुशर्रफ के भारत में आकर इस तरह के मामले को मीडिया ने ज्‍यादा गंभीरता से नहीं लिया। शायद इसलिए कि वो अब इस तरह की शख्सियत ही नहीं है कि गंभीरता से लिया जाए या फिर शायद इसलिए कि किसी के भौंकने का समाचार अखबारों में नहीं छपता। मेरा मानना है कि ऐसे लोगों को हमारे देश में आने की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए जो इस तरह की बयानबाजी करते हैं, भारत में क्‍या ऐसी कोई कानूनी धारा नहीं है जिसके तहत मुशर्रफ के खिलाफ अशांति फैलाने के प्रयास का मामला दर्ज हो सके। वैसे मदनी ने जो सजा दी वो समझदार को सुधारने के लिए काफी है। उम्‍मीद है मुशर्रफ दोबारा हमारे मामले में टांग नहीं अडाएंगे। हम साथ थे, साथ है और साथ रहेंगे।

Thursday, March 5, 2009

यादवेंद्र शर्मा 'चंद्र' की बस यादें

मुझे लगता है ब्‍लॉग जगत में साहित्‍यकारों का भारी जमावडा है। उन्‍हीं साहित्‍यकारों के लिए एक दुखद समाचार है कि हिन्‍दी जगत के विख्‍यात कथाकार यादवेंद्र शर्मा 'चंद्र' अब दुनिया में नहीं रहे। 'चंद्र' का यहां सेप्‍टीसीमिया रोग के कारण निधन हो गया। 'चंद्र' हिन्‍दी जगत के उन चंद कथाकारों व साहित्‍यकारों में शामिल थे, जिनका जीवन सिर्फ और सिर्फ लेखन को समर्पित रहा। आज जब अधिकांश लेखक अपना घर चलाने के लिए लेखन के साथ ही या तो सरकारी नौकरी करते है या फिर कोई अन्‍य कामकाज। ऐसे में चंद्र सिर्फ लेखन से जुडे रहे। किताब लिखते, बाजार में बिकती और चंद्र का घर चलता। 'चंद्र' का नाम हर कहीं अंकित है। यादवेंद्र शर्मा 'चंद्र' के बारे में कुछ जानकारी इस प्रकार है
उपन्‍यास - सन्‍यासी और सुंदरी, दीया जला दीया बुझा, हजार घोडों पर सवार, कुर्सी गायब हो गई, एक और मुख्‍यमंत्री, खम्‍मा अन्‍नदाता, पराजिता, खून का टीका, ढोकन कुंजकली, गुलाबडी, सपना, मोहभंग आदि
कहानी संग्रह - मेरी प्रेम कहानियां, श्रेष्‍ठ आंचलिक कहानियां, विशिष्‍ठ कहानियां, जमीन का टुकडा, जंजाल तथा अन्‍य कहानियां, महापुरुष आदि अनेक कथासंग्रह
नाटक - ताश का घर, महाराजा शेखचिल्‍ली, मैं अश्‍वत्‍थामा, चुप हो जाए पीटर, चार अजूबे, आखिरी पडाव, जीमूतवाहन, महाबली बर्बरिक, 
सम्‍मान - राजस्‍थान पत्रिका सृजन पुरस्‍कार की श्रेणी में वर्ष 1996 में 'गुळजी गाथा' पर पुरस्‍कृत,  साहित्‍य महोपाध्‍याय, साहित्‍यश्री,  डॉ राहुल सांकृत्‍यायन, साहित्‍य महोपाध्‍याय
विशेष - उनकी रचना 'हजार घोडों पर सवार' पर टीवी धारावाहिक बना, 'लाज राखो राणी सती' नामक पहली राजस्‍थानी फिल्‍म भी 'चंद्र' के लेखन का परिणाम थी, गुलाबडी, चकवे की बात और विडम्‍बना पर टेलीफिल्‍म बनी।

Tuesday, March 3, 2009

जीवंत है बीकानेरी पाटा


मुझे खुशी है कि बीकानेर पधारने के मेरे न्‍यौते को आप लोगों ने स्‍वीकार किया। पिछली पोस्‍ट के बाद अधिकांश लोगों ने बीकानेरी पाटों के बारे में जानने की उत्‍सुकता रखी। यह मेरे लिए और भी रोमांचक है। पाटों से पहले मैं आपको बीकानेर शहर से परिचय कराना चाहूंगा। बीकाजी ने इस शहर की स्‍थापना की। शहर पूरी तरह से एक सफील (यानि शहर के चारों तरफ एक दीवार है ) है। आज तो शहर विस्‍तृत हो गया लेकिन कुछ दशकों पहले तक शहर के चारों तरफ लगे दरवाजे बंद हो जाते थे। रात बारह बजे बाद न तो कोई शहर से बाहर निकल सकता था और न ही कोई शहर में प्रवेश कर सकता था। जस्‍सूसर गेट, नत्‍थूसर गेट, गोगागेट, शीतला गेट और कोटगेट को बन्‍द कर दिया जाता। रात के समय शहर पूरी तरह एक घर की तरह बन्‍द हो जाता। ठीक वैसे ही यहां के बाशिन्‍दे आराम की नींद सोते जैसे आप अपने घर का दरवाजा बन्‍द करके सोते हैं। शहर के अंदर बने घरों के दरवाजे खुले रहते क्‍योंकि शहर बाहर से पूरी तरह बन्‍द है। रात में लोग ठीक वैसे चौक में बैठ जाते जैसे आप नींद नहीं आने पर घर की लॉबी में बैठ जाते हैं। 1980 से पहले बीकानेर में दूरदर्शन का दर्शन नहीं था इसलिए सिर्फ पाटे ही एकमात्र वक्‍त काटने का स्‍थान था। हर चौक में एक पाटा रख दिया गया, इस पर दिन में बुजुर्ग बैठते तो शाम को किशोर शतरंज की चाल चलाते हैं और रात को युवा और अधेड एक साथ बैठकर चर्चा करते हैं। सर्दी हो या गर्मी बीकानेर के पाटे कभी सूने नहीं रहते। पाटों पर शहर हर वक्‍त जागता रहता है। पाटा है कि कभी सोता नहीं, उसकी गोद में कोई न कोई बैठा ही रहता है। ऐसे चौक भी हैं, जहां रातभर रौनक रहती है। अब चुनाव का मौका है तो आप बीकानेर के किसी भी पाटे पर पहुंचकर देश की हर सीट के बारे में चर्चा कर सकते हैं। यहां के लोगों सामान्‍य ज्ञान इतना बेहतर है कि दक्षिण की एक एक सीट के बारे में भी इन पाटों पर चर्चा सुन सकते हैं। अगर आप भटटडों के चौक में स्थित पाटे पर शाम को पहुंचे तो सच मानिए सुबह तक वहां से उठ नहीं सकेंगे। आपको आश्‍चर्य होगा कि पाटे के चारों और बसे लोग यहां आकर बैठ जाते हैं। घर वाले खाने के लिए आवाजें लगाते लगाते थक जाते हैं तो पाटे पर ही थाली पहुंचा देते हैं। खाना किस घर से आया है किसी को इससे सरोकार नहीं है, भूख है तो उठाया और खा लिखा। ऐसा भी होता है कि आवाज लगातार रात को दो बजे घर की महिलाओं से खाना मंगवा लिया जाता है। मोहतों के चौक में स्थित पाटे पर भी आपको रातभर रौनक मिलेगी। हर्षों के चौक में स्थित पाटे पर तो आपको शतरंज की चाल चलने का अवसर भी मिल सकता है। यहां शाम से देर रात तक शतरंज की इतनी चाले चलती है कि खुद लकडी का वजीर भी बोल देता है 'भाई बस करो, थक गया हूं।' हर चौक में लकडी का बना पाटा ही लगा है। इन पाटों की उम्र कम से कम सौ वर्ष है। कुछ ऐसे चौक भी है, जहां हाल ही में पाटे लगे हैं। अब फैल चुके शहर के लोग दूर कॉलोनियों में भी रहने लगे हैं लेकिन रात को एक बार पाटे पर आए बिना उनको नींद नहीं आती। इन्‍हीं पाटों पर जीवन के संघर्ष की कहानी है तो इन्‍हीं पाटों पर दुख दर्द भी बंट जाता है, इन्‍हीं पाटों पर बैठकर स्‍कूल के लिए बस का इंतजार होता है, इन्‍हीं पाटों पर कॉलेज जाने के लिए साथी का इंतजार होता है, इन्‍हीं पाटों पर ऑफिस जाने से पहले ब्रिफकेस रखी जाती है तो इन्‍हीं पाटों पर लाडो और लाडी की सगाई तय हो जाती है, इसी पाटे पर पाते और दोहिते होने की मिठाई बंटती है। पाटा जीवन से पहले और जीवन के बाद तक साथ देता है। मृत्‍यु के बाद इन्‍हीं पाटों पर 'बैठक' भी होती है। इन्‍हीं पाटों पर अगली पीढी अपने जीवन का सफर तय करती है। सच मानिए इस पाटे पर जीवन है। सच मानिए अगर आप रुचि लेंगे तो पाटो से जुडे कई रोचक तथ्‍य भी आगे बताऊंगा। 

Thursday, February 26, 2009

पधारो म्‍हारे सैर बीकानेर


शहर के ठीक बीच में खडे होकर किसी भी दिशा में पांच किलोमीटर के लिए निकल जाए आपको समुंद्र नजर आएगा।मिट़टी का समुंद्र। दूर तक इंसान तो क्‍या घास फूस भी नहीं दिखेगा। कुलाचे मारता हरिण आपका मनोरंजन कर सकता है तो कभी कभार ऊंट पर लदे बच्‍चे  आपके आगे से गुजरते हुए अपनी हंसी से आपको गुदगुदा सकते हैं। ढेढ देहाती अंदाज में यहां का ग्रामीण सिर पर पगडी बांधे आपको जींस और टी शर्ट में अचरज भरा देख सकता है। औरतों का चेहरा देखना आपकी किस्‍मत में नहीं  होगा, क्‍योंकि मुंह ढककर चलने की परम्‍परा को यहां के बाशिन्‍दे आज भी निभा रहे हैं। यह बीकानेर है। आप शायद बीकानेर को पापड और भुजिया के लिए जानते होंगे या फिर हमारे नए सितारे संदीप आचार्य, राजा हसन और समीर (तीनों युवा गायक)  के कारण जानते होंगे। मैं आपको अपने शहर में इसलिए लाया हूं क्‍योंकि यहां घूमने का मजा इन्‍हीं दिनों में है। आप यहां आ नहीं सकते, इसलिए यहां की मस्‍ती से मैं आपको नियमित रूप से रूबरू करने का प्रयास करूंगा। इस शहर की मस्‍ती दुनिया के किसी भी शहर के आगे ज्‍यादा चमक रखने वाली है। यहां के लोग इतने संतोषप्रद है कि बडी से बडी समस्‍या को झेल लेंगे लेकिन झगडा नहीं करेंगे। यहां हिन्‍दू भी है और मुसलमान भी। दोनों बडी संख्‍या में है फिर भी कभी साम्‍प्रदायिकता ने इस शहर को अपनी जद में नहीं लिया। ऐसे मुसलमान भी है जो ब्राह़मणों की तरह प्‍याज तक नहीं खाते तो ऐसे हिन्‍दू भी है जो मुसलमानों के घर को अपना परिवार समझते हैं। होली हो या दीवाली मुस्लिम मोहल्‍ले भी कम रोमांच में नहीं होते। घर पर दीपक भले ही न जले लेकिन पटाखों की धूम और नए कपडे पहनकर शहरभर में घूमने में वो भी पीछे नहीं। रोजे के वक्‍त हिन्‍दूओं के घर खाना बनता है और मुस्लिम के घर जाकर रोजा खुलवाया जाता है। ऐसे परिवारों की संख्‍या लम्‍बी चौडी है जो किसी न किसी रोजेदार को अपने घर का खाना खिलाने की होड में रहता है। यहां जगह जगह दरगाहें हैं। हर छोटे बडे काम के लिए हिन्‍दू इन्‍हीं दरगाहों के आगे मत्‍था टेकते हैं और काम होने पर फिर मत्‍था टेकने जाते हैं। आपने बडे शहरों को रात में जागने के किस्‍से तो सुने होंगे, अब मेरे शहर का नाम भी इसी सूची में डाल दें। बीकानेर शहर रात को भी जागता है। पान की दुकान रात को दो बजे से पहले  बंद नहीं होती और ताश कूटते कूटते चार बजाना यहां हर चौक का शगल है। यहां चौक ठीक वैसे ही हैं, जैसे घर में होते हैं। आप नींद से उठकर सीधे अपने घर के चौक (आंगन) में पहुंचते होंगे, वहीं बैठकर सोफे पर चाय पीते होंगे। मेरे शहर में लोग उठकर सीधे घर से बाहर निकलते हैं चौक में रखे पाटे पर बैठते हैं और वहीं चाय पीते पीते दिनभर का कार्यक्रम तय करते हैं। इन्‍हीं पाटों पर दिन में वृद़ध जन अपनी टीम के साथ बैठकर अखबारों को खंगालते हैं, हर खबर की मुरम्‍मत करते हैं, अमेरिका से लेकर पास वाले चौक तक की खबरों  का आदान प्रदान करते हैं, चर्चा करते हैं, कभी कभी बहस करते हैं और बहस बाद में बोलचाल तक बदल जाती है। अगले ही पल बहस को खत्‍म करने के लिए रबडी मंगा ली जाती है। जिसने ज्‍यादा जोर से बोला उसे रबडी के उतने ही ज्‍यादा पैसे देकर जुर्माना भरना होगा। यहां गलियां छोटी और संकडी है लेकिन दिल बहुत बडे हैं। चौक में सफाई के लिए आने वाली नगर निगम की सफाई कर्मचारी का विवाह चौक वाले कर देते हैं क्‍योंकि उसकी लडकी उनके  देखते देखते बडी हो गई तो चौक की भी बेटी हुई ना। यहां बडे से बडा गम हवा हो जाता है और बडी से बडी खुशी बंटती बंटती सभी का आल्‍हादित कर देती है। पाटा यानि चौक में लगा लकडी का लम्‍बा चौडा तख्‍त। इसी पाटे पर ब्‍याह शादी में दुल्‍हा बैठता है और इसी पाटे पर शोक के दिनों में बैठक होती है। हर पाटे का अपना इतिहास है और पाटे का अपना संघर्ष है। इन पाटों ने शहर को बदलते देखा है और संस्‍कृति के बदलते अंदाज को भोगा है, फिर भी कहूंगा पाटों  के दम  पर ही इस शहर की जीवनशैली आज तक जीवित है। अब आप सोचेंगे कि मैं आपको अचानक अपने शहर की तरफ क्‍यों ले आया। दरअसल मेरे शहर में इन दिनों सर्वाधिक रौनक है। पता नहीं दूसरे शहरों में होली कैसे और कितने दिन मनाते हैं लेकिन मेरे शहर बीकानेर में होली शुरू हो चुकी हैं। चंग की थाप हर किसी को अपनी ओर खींच रही है तो हल्‍की सर्द हवाओं के बीच जगह जगह चंग की धमाल पर स्‍वांग नाचते दिख सकते हैं। अगर आप पसन्‍द करें तो मैं मेरे शहर की होली से आपको हर रोज रूबरू करवा सकता हूं। सिर्फ चंग ही नहीं हर्ष और व्‍यास जाति के बीच होने वाले डोलची खेल में भी आपको ले जाऊंगा। जहां एक एक बार करके हर्ष और व्‍यास जाति के लोग एक दूसरे की पीठ पर पानी से वार करते हैं। यह वार इतना घातक होता है कि दिल में उतर जाता है, जितना तेज पडता है प्‍यार उतना ही बढता है। यहां रंगकर्म का अनूठा अंदाज ''रम्‍मत'' सभी को चौंकाने वाला है। साठ वर्ष का अदाकार जब रात से सुबह तक मंच पर अभिनय करते करते सुबह डॉयलाग बोलता है तो एक किलोमीटर दूर भी लोगों को आवाज बिना माइक के सुनाई देनी है। अगर आप बीकानेर की होली से रूबरू होना चाहते हैं तो इच्‍छा जताए ताकि मैं उतने ही जोश के साथ लिख सकूं।

Wednesday, February 25, 2009

जीत में क्‍यों ढूंढ रहे हैं हार ?


हम भारतीय ऐसे क्‍यों हैं। हमें अपनी जीत पर खुशी क्‍यों नहीं होती। हम हर जीत में एक हार को क्‍यों ढूंढ लेते हैं। हम वैसे क्‍यों नहीं हो जो हमारी जीत पर अपना नाम अटकाकर खुशी मना रहे हैं। जी, बिल्‍कुल सही मैं 'स्‍लमडॉग मिलेनियर' की ही बात कर रहा हूं। कल जब से भारत को ऑस्‍कर मिला है तब से दो तरह के लोग सामने आए। एक वो जो इसे खुशी के इजहार का वक्‍त बता रहे तो दूसरे वो जो इसे हमारी गरीबी का मजाक बता रहे हैं। गरीबी का मजाक तो उडा है लेकिन क्‍या ऐसा पहली बार हुआ है, क्‍या ऑस्‍कर में सिर्फ भारतीय गरीबी पर बनी फिल्‍म को  ही पुरस्‍कृत किया गया है, क्‍या इससे पहले किसी दूसरे देश की गरीबी पर बनी फिल्‍म को ऐसा सम्‍मान नहीं मिला। क्‍या भारत में ही गरीबी है। आज तो स्‍वयं अमेरिका गरीबी की दहलीज पर खडा है। कल उस पर भी फिल्‍म बनेगी और परसो उसे भी ऑस्‍कर मिलेगा। स्‍माइल पिंकी में भारतीय गरीब लडकी पिंकी और एक बीमारी को लेकर साधारण फिल्‍म बनाई गई। फिल्‍म भी नहीं बल्कि डोक्‍यूमेंटी बनाई गई। 'स्‍लम डॉग मिलेनियर' में जो कुछ दिखाया गया वो सामाजिक ताने बाने को दिखाने वाला है। अगर हमें 'लगान' पर यह पुरस्‍कार मिलता तो हम इसमें भी अंग्रेजीयत का आभास होता। क्‍या सत्‍यजीत रे को मिला पुरस्‍कार भी किसी अंग्रेजीयत का असर था। क्‍या गांधी फिल्‍म के लिए मिला पुरस्‍कार भी किसी गोरी चमडी का कमाल था। क्‍या इस बार रहमान को मिला पुरस्‍कार भी अंग्रेजों के कारण मिला। क्‍या फिल्‍म  में काम कर रहे भारतीय कलाकारों की अदाकारी ऐसी नहीं थी जो फिल्‍म को पुरस्‍कार के योग्‍य बना देती है। क्‍या इन भारतीय कलाकारों के बी फिल्‍म को इतना बडा सम्‍मान मिल सकता था। शायद नहीं। भले ही टीम का कोच गैरी कस्‍टर्न हो या फिर ग्रेग चैपल रन तो धोनी और सचिन को ही बनाने होंगे। इस फिल्‍म में भी निर्देशक भले ही कोई हो खिलाडी तो हमारे ही है। हमें तो यह साबित करना है कि जो देश दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनने जा रहा है वो हर क्षेत्र में श्रेष्‍ठ है। भारत अब किसी भी क्षेत्र में रुकने वाला नहीं है। हमें भी जीत में सिर्फ जीत ही देखनी चाहिए। वरना पीछे रहने की हमारी सोच और मजबूत होती जाएगी। हम श्रेष्‍ठ है इसलिए हमें ऑस्‍कर मिला। आगे भी मिलेगा। इतिहास गवाह है जब जब भारतीयों ने किसी क्षेत्र में अपनी काबलियत साबित करनी चाही है तब तब हमने ऐसा किया है। स्‍लमडॉग

Monday, February 23, 2009

हम फिल्‍मों के 'भी' सरताज ''थैंक्‍स रहमान & पिंकी ''


बधाई हो भारत। उत्‍सव का अवसर है, मौका है झूमने का, गाने का, आतिशबाजी करने का, गलियों में 'हो' 'हो' करके अपना उत्‍साह दिखाने का। मुझे पूरी तरह तो नहीं लेकिन कुछ कुछ याद है कि जब कपिल इलेवन ने क्रिकेट का विश्‍वकप जीता तो खूब हो हल्‍ला हुआ था। मेरे शहर बीकानेर में जैसे हर घर में विवाह शादी है, हर कोई पटाखे छोड रहा था। आज सुबह साढे छह बजे से ग्‍यारह बजते बजते भारत ने एक दो नहीं बल्कि 9 विश्‍व खिताब जीत लिए लेकिन पटाखे तो दूर किसी ने पचास पैसे का एसएमएस करके भी बधाई नहीं दी। ऑस्‍कर में सत्‍यजीत रे को लाइफ एचीवमेंट पुरस्‍कार मिला तब भी कुछ भारतीय फिल्‍मकारों ने एक दूसरे को बधाई दी और बात खत्‍म। आमीर खान जब से नोमिनेट हो रहे थे तब से उनके लिए दुआ कर रहे थे, आज रहमान ने आमीर का यह सपना पूरा कर दिया। किसी भी भारतीय को यह जीत कम नहीं आंकनी चाहिए। बात सिर्फ फिल्‍मों की नहीं है, बात ऐसे क्षेत्र में विजय पताका फहराने की है जिसमें प्रतिस्‍पद़र्धा हर कदम पर है। क्रिकेट खेलने वाले दुनिया के दो दर्जन देश भी नहीं है लेकिन फिल्‍म बनाने वाले देशों की संख्‍या सैकडों में है। ऐसे में पश्चिमी देशों में तो फिल्‍म एक पूजा है, पैशन है। हर फिल्‍म दूसरे से बेहतर है। इस बीच भारतीय फिल्‍मकारों का प्रयास सफल हुआ तो हमें प्रसन्‍नता होनी चाहिए। आज जब भारत हर क्षेत्र में श्रेष्‍ठता साबित कर रहा है, ऐसे में फिल्‍म के क्षेत्र में मिली सफलता निश्चित रूप से सराहनीय है। उत्‍सव योग्‍य है। 'स्‍लमडॉग मिलेनियर' हो या फिर 'स्‍माइल पिंकी' दोनों के कलाकारों को सिर माथे चढाना ही होगा। अल्‍ला रखा रहमान भारतीय सिनेमा में अब सत्‍यजीत रे के नजदीक पहुंच गए हैं और कई बडे दिग्‍गजों को पीछे छोड चुके हैं। देश में इन दिनों क्रिकेट का बुखार ज्‍यादा है इसलिए मैं उसी भाषा में कहूंगा 'रहमान फिल्‍मों के धोनी है' सच में सब को धो डाला। भारतीय फिल्‍म के इस सबसे बडे दिन पर सभी ब्‍लॉगर्स को बहुत बहुत बधाई। आज के दिन को भारतीय फिल्‍म में विशेष रूप से न सिर्फ केवल आज बल्कि हर वर्ष मनाया जाना चाहिए। कैसे मनाया जाए यह फैसला आप करें और अपना सुझाव दें। हम ब्‍लॉगर्स की भी जिम्‍मेदारी है कि हम इस बडे दिन को विशेष स्‍वरूप में मनाने के लिए सुझाव दें। मैं प्रयास करूंगा कि जो भी सुझाव आएंगे उन्‍हें आगे तक पहुंचाऊंगा।  photo by bbc news. (with Thanks)

Sunday, February 22, 2009

इस देश में ही आना लाडो


मेरा आठ वर्ष का बेटा इस बात से अनभिज्ञ है कि लडका और लडकी में क्‍या भेद हैं ? उसने मुझे पिछले दिनों एक अजीब सवाल किया। सवाल सुनकर मैं दंग था कि उसे यह सवाल पूछने की क्‍या जरूरत आ गई? उसने पूछा कि दुनिया के किस देश में लडकी को पैदा होते ही मार दिया जाता है? निश्चित रूप से यह सवाल उसकी उम्र और मानसिक स्‍तर से हटकर था। मैंने सवाल को टालते हुए उससे किनारा किया तो उसने स्‍वतस्‍फूर्त जो जवाब दिया वो मुझे और भी चकित करने वाला था। उसने कहा कि डैडी भारत में बेटी को पैदा होते ही मार देने की परम्‍परा रही है। मेरे बेटे की किसी भी किताब में यह सवाल नहीं है। मेरे घर में चार लडके और एक लडकी है। कभी ऐसा भेद नहीं हुआ कि उसे यह सवाल करने पडे। जिस सामाजिक व्‍यवस्‍था में वो पल बढ रहा है, वहां से भी ऐसा सवाल उपजने का सवाल पैदा नहीं होता। वो एक छात्र विद्यालय में पढता है लेकिन लडकियों के बारे में ऐसे विचार तो वहां भी नहीं रखे जाते। उसे तो अपने सवाल का जवाब कहीं न कहीं से मिल गया लेकिन मेरे लिए चिंता बढ गई कि उसने यह सवाल उठाया कहां से ? मैंने अपने भतीजे से पूछा कि यह सवाल क्‍यों किया ? बारह वर्षीय भतीजे पीयूष ने बताया कि टीवी में एक नाटक आ रहा है जिसमें बताया गया कि बेटी को पैदा होते ही मार दिया जाता है। बेटिया होती ही ऐसी है। छानबीन करने पर पता चला कि मेरे बेटे सहित घर के पांचों बच्‍चे इन दिनों टीवी पर प्रसारित हो रहे नाटक को नियमित देखते हैं। इस नाटक में बेटी को अभिषाप के रूप में बताया गया है। भले ही नाटक का भाव शुद़ध है लेकिन वर्तमान परिवेश में जिन बच्‍चों को बेटे और बेटी में भेद नहीं पता, उन्‍हें टीवी का यह सीरियल भेद बता रहा है। इस सीरियल में वर्तमान युग में बेटियों के साथ हो रही ज्‍यादती को दर्शाया गया है। एक तरफ नाटक के किरदार मोबाइल फोन पर बात करते दिखाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ दस वर्ष की बच्‍ची को ससुराल में और ग्‍यारह वर्ष की बेटी को बाल विधवा के रूप में दिखाया गया है। जहां तक मेरा मानना है देश में अब बाल विवाह की स्थिति खत्‍म होने के कगार पर है। जो बाल विवाह हो रहे हैं वो भी सोलह से 18 वर्ष के बीच के हैं। वैसे भी इतनी जागरुकता आ चुकी है कि लोग ही ऐसे विवाह रुकवा देते हैं। बाल विधवा जैसे हालात भी अब नहीं है। फिर भी कहीं ऐसी दुर्घटना हो भी जाए तो ससुराल वाले इंसानियत के दम पर बच्‍ची को अपनी पलको पर बिठाते हैं। मैने तो ऐसे किस्‍से भी देखे हैं कि वयस्‍क बच्‍ची को शादी के कुछ माह में ही विधवा होने पर ससुराल वाले धूमधाम से दूसरी शादी कर देते हैं। अगर किसी ठेठ ग्रामीण अंचल में ऐसा हो भी रहा है तो वहां ऐसे नाटक देखने वाले नहीं होंगे। कुल मिलाकर मेरे कहने का तात्‍पर्य सिर्फ इतना है कि जिस परिवेश में हम बाल विवाह और बाल विधवा जैसे संकट से दूर होना सीख रहे हैं, तब इसी को आधार बनाकर नाटक दिखाना कहां तक जायज है। हम क्‍यों छोटे बच्‍चों को यह सोचने पर मजबूर कर रहे हैं कि बेटी होना अभिषाप है। उनके कारण घर वालों को जगह जगह नाक रगडनी पडती है। ऐसे नाटकों का प्रसारण कहां तक जायज है जो बडे बर्तन में जिंदा बेटी को मारते हुए दिखाए। हम क्‍यों यह साबित करना चाहते हैं कि ऐसी व्‍यवस्‍था हमारे देश में रही है। बेहतर होगा कि हम ऐसे सीरियल तैयार करें जो बालिका वधु के बजाय बालिका प्रतिभा के रूप में दिखे। यह सुनाया जाए कि 'लाडो आना ही होगा इस देश में।' यह मेरा विचार है कि ऐसी सामग्री नहीं परोसनी चाहिए जिससे नई पीढी बालक और बालिका में भेद करना सीखे। देश और समाज की भलाई टीआरपी से नहीं बल्कि सांस्‍कृतिक ताने बाने को सुधारने से होगी। अब तो ऐसी दादी भी नहीं जो लडकियों से इतनी घृणा करें। देश में उन लोगों की संख्‍या बढ रही है जो एक लडकी के बाद भी 'परिवार कल्‍याण' में विश्‍वास करने लगते हैं।