बात से मन हल्‍का होता है

Thursday, January 15, 2009

पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ पहला दिन

11 सितम्‍बर 2006 को हमारा पहला दिन पनॉस साउथ एशिया के मीडिया सेंटर में था। हमें हर हाल में दस बजे काठमांडू में ही स्थित पनॉस के मीडिया सेंटर पर उपस्थिति देनी थी। नेपाल के प्रतिष्ठित समाचार पत्र नेपाली टाइम्‍स व मैगजिन हिमालयन के कार्यालय से कुछ ही दूरी में एक गली में लेकिन हरियाली से लखदख थी यह गली। पनॉस का कार्यालय छोटा लेकिन हम बारह पत्रकारों के लिए बना मीडिया सेंटर विशेष छोटा नहीं लग रहा था। हम सभी वहां पहुंचे तो औपचारिक परिचय हुआ। औपचारिक इसलिए क्‍योंकि हम पहले ही होटल में साथ साथ रह चुके थे और नाम से एक दूसरे को पहचान गए। हमारे बीच में दो अनजान चेहरे थे। सोचा दोनों ही भारत के प्रमुख समाचार पत्र से होंगे। फिर सोचा दोनों में एक भारतीय और दूसरा पाकिस्‍तानी होगा। अभी चिंतन चल ही रहा था कि यह परिचय करा दिया गया कि दोनों मंचस्‍थ पाकिस्‍तान के हैं। हमारा तो जैसे मूड ही ऑफ हो गया। पाकिस्‍तानी पत्रकारों से  हमें क्‍या सरोकार। हमारी कार्याशाला का विषय था   "Absence of war is not peace" जिन लोगों को वार के अलावा कुछ आता नहीं उनसे पीस की बात सुनना हमारा लिए आश्‍चर्यजनक था। मूल रूप से हमें यह सिखाने का प्रयास भी हुआ कि जब देश में युद़ध के हालात हो या फिर बडा झगडा फसाद हो तो किस तरह से रिपोर्टिंग करनी चाहिए। सबसे पहले पाकिस्‍तानी पत्रकार जाहिद हुसैन ने हमें पाकिस्‍तान के हालात बताने शुरू किए। उन्‍होंने बेबाक तरीके से कहा कि विकट परिस्थितियों में रिपोर्टिंग का जितना अवसर पाकिस्‍तानी पत्रकार को मिल रहा है, उतना भारतीय पत्रकार को नहीं मिल रहा। कारण साफ है कि पाकिस्‍तान में हर तरफ से हमला हो रहा है। घर के अंदर हमला, बाहर से हमला और अपने ही पाले ही हुए लोगों का हमला। अपने करीब दो घंटे के लेक्‍चर में उन्‍होंने पाकिस्‍तान की दुर्दशा का बकायदा चित्रण किया। तत्‍कालीन राष्‍टपति परवेज मुशर्रफ के कारण बिगडे हालात का भी जिक्र किया। उन्‍होंने ऐसे हालात में हो रही पत्रकारिता के कुछ नमूने भी गिनाए। हुसैन यह कहने से नहीं हिचकिचाए कि पाकिस्‍तान में पत्रकारिता कठिन काम है। पाकिस्‍तान में सिर्फ भारत से युद़ध ही युद़ध नहीं है बल्कि घर में ही कई तरह के युद़ध चल रहे हैं। ऐसे में भारत से युदध्‍़ा नहीं होने का आशय पाकिस्‍तान में शांति होना वाकय नहीं था। इसके बाद भारत पाक सीईओ बिजनस फार्म के अध्‍यक्ष आमीन हासवानी ने भी अपनी बात कही। पहले पाकिस्‍तानी पत्रकार ने जिस संजीदगी के साथ अपनी बात कही और पाकिस्‍तान की दुर्दशा बयां कि उससे विपरीत हाशमी ने भारतीय मीडिया पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए। उन्‍होंने यहां तक कह दिया कि जब क्रिकेट मैच होता है तो भारतीय मीडिया पाकिस्‍तान की खिलाफत करता है। मेरे एक सवाल से वो नाराज हुए कि जब मियादाद मैदान में कूदता है तो उसे जं‍पिंग मियादाद के अलावा क्‍या कहा जा सकता है। उन्‍होंने बताया कि जब पाकिस्‍तान के सीईओ भारत आए तो तत्‍कालीन मंत्री यशवंत सिन्‍हा ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया। भारतीय मीडिया और नेताओं में पाकिस्‍तान के प्रति दुर्भावना है। उनका यह कथन चुभने वाला था। भारतीय मंत्री से नहीं मिलने देने का अपना दुखडा काफी देर तक हमारे सामने रोया। हाशमी की किसी भी बात से विषय का कोई सरोकार नहीं था। हम पहले लेक्‍चर से जहां प्रभावित हुए, वहीं दूसरे वक्‍तव्‍य पर निराश हुए।  एक बार तो बात बिगड रही थी लेकिन जैसे तैसे सुधर गई। दरअसल मुझे लगा कि हाशमी पत्रकार थे ही नहीं। उन्‍होंने तो भडास ही निकालनी थी। हमारे विरोधात्‍मक सवालों के बाद उन्‍होंने अपनी बात संक्षिप्‍त कर दी। क्रिकेट को लेकर उनकी टिप्‍पणियों का जवाब देते हुए तो हमें ऐसे महसूस हो रहा था जैसे हम भी क्रिकेट के मैदान में ही खडे हैं और हर हाल में सामने वाले को जवाब देना है। पहले दिन के इस अनुभव के बाद हमारी शाम एकदम अलग थी। जिन मुद़दों पर सुबह हुसैन ने चर्चा की थी, उन्‍हीं पर हमने शाम को बाजार में घूमते घूमते पाकिस्‍तानी पत्रकारों से चर्चा की। उनकी विचारधारा उम्‍मीद से विपरीत थी। हमारी चर्चा का मूल आधार परवेज मुशर्रफ और पाकिस्‍तानी सेना था। इन पर पाकिस्‍तानी पत्रकार सौहेल और जुबैर की बात सुनकर मैं स्‍वयं दंग रह गया। 
इस पर चर्चा कल ही कर सकेंगे। 

Wednesday, January 14, 2009

छह दिन पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ


आज जब समूचा मीडिया भारत और पाकिस्‍तान के बीच संघर्ष की नींव रखने में जुटा है। ऐसे में पाकिस्‍तानी पत्रकारों को मित्र कहना शायद कुछ लोगों को अच्‍छा नहीं लगे। पिछले कुछ दिनों से सोच रहा था कि इस मुद़दे पर ब्‍लॉग पर लिखूं या नहीं। फिर सोचा अपना विचार तो रखना ही चाहिए। इसीलिए मैं पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ गुजारे छह दिन की यात्रा आपके साथ लगातार छह दिन ही बांटना चाहूंगा। 
सितम्‍बर 2006 में मुझे अपने समाचार पत्र राजस्‍थान पत्रिका के माध्‍यम से नेपाल के काठमांडू में आयोजित छह दिवसीय कार्यशाला में हिस्‍सा लेने का अवसर मिला। इस कार्यशाला में भारत  और पाकिस्‍तान से छह छह पत्रकारों को आमंत्रित किया गया था। विशेष बात यह थी कि दोनों ही देशों के भारत सीमा के निकटवर्ती रहने वाले लोगों को पेनॉस साउथ एशिया नामक इस संस्‍थान ने आमंत्रित किया था। पाकिस्‍तान के सीमावर्ती भारत के बीकानेर में रहने का लाभ मुझे मिला। भारत से मेरे साथ चण्‍डीगढ की कंचन वासदेव, गुजरात के उर्वेश कोठारी, कश्‍मीर टाइम्‍स के अरुण शर्मा, हैडलाइन टूडे के सक्‍का जैकब भी थे। इसके अलावा जी न्‍यूज  के पत्रकार राहुल सिन्‍हा का भी चयन हुआ लेकिन वो आये नहीं। वहां हमें काठमांडू के होटल हिमालय में आवास की सुविधा दी गई। यह लगभग फाइव स्‍टार होटल था और इसे देखकर नहीं लगता था कि नेपाल छोटा देश है और यहां सुविधाएं नहीं है। खैर  होटल हमारा विषय नहीं है। हम पाकिस्‍तानी पत्रकारों से पहले ही नेपाल पहुंच गए थे, इसलिए पहले हमें होटल पहुंचने का अवसर मिला। ऐसे में सभी भारतीय पत्रकारों के नाम से एक एक कमरा आवंटित हो गया। कुछ ही देर में पाकिस्‍तानी पत्रकार भी वहां पहुंच गए। अभी हम अपने अपने कमरे में सामान रखकर बतिया रहे थे कि रिसेप्‍शन से फोन आया कि पाकिस्‍तानी पत्रकार भी आपके साथ ही रहेंगे। यानि एक कमरे में एक भारतीय और एक पाकिस्‍तानी पत्रकार छह दिन तक साथ साथ रहेंगे। मैं और मेरे साथी चकित थे। हमने रिसेप्‍शन पर पहुंचकर इसका विरोध किया। हमें पाकिस्‍तानी शब्‍द ही अच्‍छा नहीं लग रहा था ऐसे में उनके साथ छह दिन रहना, हमारे लिए मानों कोई अत्‍याचार था। रिसेप्‍शन पर पहुंचने पर पता चला कि जिस संस्‍था ने हमें यहां आमंत्रित किया है, उसी के संचालकों ने यह व्‍यवस्‍था की है। उन्‍हीं में से एक डैनी से हमने बातचीत की। उन्‍होंने बताया कि दोनों देशों के पत्रकार साथ रहेंगे तभी तो एक दूसरे को समझेंगे, एक दूसरे की समस्‍या को समझ सकेंगे। हमने जैसे तैसे भारी मन से पाकिस्‍तानी पत्रकारों के साथ रहने की स्‍वीकृति दे दी। अब मेरे साथ एक पाकिस्‍तानी पत्रकार अशफाक को मेरे साथ जोडा गया। अशफाक वहां के दैनिक समाचार पत्र डॉन से जुडा हुआ था। हमारे साथ पाकिस्‍तान की पत्रकार बतुल फातमा भी थे जो आजकल पाकिस्‍तान में असिस्‍टेंट ऑडिट जनरल है। यानि अब पत्रकार नहीं बल्कि पाकिस्‍तानी ब्‍यूरोक्रेट है। छह दिन तक हम लोगों ने एक दूसरे को समझा। एक दूसरे के साथ घूमे, मौज मस्‍ती की। अपने मन में पाकिस्‍तान के बारे में जो सवाल थे वो सब किए। इतने किए कि पाकिस्‍तानी मित्र भी बोल देते यार आप पाकिस्‍तान के बारे में ऐसा क्‍यों सोचते हैं। हमार सवाल होता कि आप भारत के बारे में क्‍यों सोचते  हैं? हमारी बातों में कभी अमिताभ बच्‍चन होते तो कभी शोएब अख्‍तर और मियादाद। कभी पाकिस्‍तान के मंदिरों पर चर्चा होती कभी कभी भारत की मस्जिदों पर। कभी गाय की पूजा पर चर्चा होती कभी पाकिस्‍तान में गायों के वध पर। बहुत बातें हुई, कुछ सलवट कम हुई तो कुछ बढी। जैसा भी छह दिन का सफर रहा, वैसा ही आपके साथ बाटूंगा। बस हर रोज हमें याद करते रहिए।

Tuesday, December 30, 2008

एक अनूठा क्रिसमस

निश्चित रूप से क्रिसमस पर अभी लिखने का वक्‍त नहीं है, क्रिसमस का त्‍यौहार बीते करीब एक सप्‍ताह हो रहा है, लेकिन यहां मैं इतने विलम्‍ब से उल्‍लेख कर रहा हूं क्‍योंकि मेरे बेटे ने क्रिसमस आज ही मनाया, वो अपने नाना के घर था, इस बीच क्रिसमस का त्‍यौहार आया और चला गया, चूंकि मैं क्रिश्‍चयन धर्म से इतना जुड़ाव नहीं रखता, इसलिए क्रिसमस की किसी भी औपचारिकता को निभाने का सवाल नहीं उठता, आज दोपहर बाद मैं जब घर में घुसा तो सभी बच्‍चे मेरे छोटे कमरे में जमघट लगाए हुए थे, मेरे बेटे मयंक ने सुबह मेरे से मोरपंख पौधे का गमला नीचे से ऊपर क्‍यों मंगवाया, यह भी मेरी समझ में अब आया, उसने मोरपंख पौधे के चारों और दीपावली पर सजावट के काम आने वाली छोटी छोटी लाइटस का घेरा डाला, रंग बिरंगी लाइट़स के बीच उसने अपनी जन्‍मदिन के बचे हुए स्‍टार को लगाया, कुछ गुब्‍बारे भी सजाए, वो अपने साथियों के साथ जिंगल बैल जिंगल बैल गा रहा था, उसके साथी बड़े जोश के साथ क्रिसमस के पांच दिन बाद की इस क्रिसमस का आनन्‍द ले रहे थे, दरअसल मेरा बेटा शहर के एक क्रिश्‍चयन स्‍कूल में पढ़ता है, वहां क्रिसमस का त्‍यौहार अन्‍य त्‍यौहारों की तरह बड़े उत्‍साह से मनाया जाता है, उसके साथी ऐसी स्‍कूल नहीं पढ़ते इसलिए उन्‍हें क्रिसमस का ज्‍यादा ज्ञान नहीं था, अपने धर्म से हटकर उसका यह उत्‍साह मुझे रास आया, मैं यह सोचकर अब स्‍वयं को छोटा महसूस करता हूं कि यह मेरा धर्म है और वह उसका, बेटे की उम्र अभी सात वर्ष है, इसलिए वो इस सोच के साथ दुनिया में विचरण नहीं कर रहा,  चाहता हूं कि भविष्‍य में भी वो इसी तरह दीपावली होली के साथ ईद व क्रिसमस का त्‍यौहार भी मनाए

Tuesday, December 16, 2008

आप कैसे पत्रकार ?

पिछले दिनों हमारी चर्चा न तो राजनीतिक थी और न साहित्‍य की! इसके बाद भी मामला जाते जाते अंत में पत्रकारिता तक पहुंच ही गया ! गलत भी नहीं था, जैसे माहौल में रहते हैं, वैसे ही मुद़दों पर चर्चा हो सकती है ! हमारे साथ बैठे एक सज्‍जन ने बहुत अच्‍छी बात कही ! उनका कहना था कि मानस में भी पत्रकारों का चित्रण हैं, मेरे लिए यह सुनना आश्‍चर्यजनक था ! इस तथ्‍य को समझना चाहा तो उन्‍होंने बताया कि मानस में एक पत्रकार मंथरा थी और दूसरे हनुमान जी ! एक पत्रकार के रूप में ही मंथरा ने जैसा स्‍वयं सोचा वैसा ही जाकर कैकयी को बता दिया! उनकी यह बात कैकयी ने जैसी मन में उतारी वैसा ही काम कर दिया ! बाद में भले ही मंथरा और कैकयी दोनों को अपनी सूचना और सोच पर पछतावा हुआ होगा लेकिन उनकी गलत सूचना ने मानस में नया अध्‍याय जोड दिया था! इसके बाद दूसरे पत्रकार के रूप में भगवान श्री हनुमान है, उन्‍हें एक टास्‍क दिया गया कि वो सीता माता का पता लगाए ! पूरी निष्‍ठा और चिंतन के साथ वो समुंद्र पार करके लंका पहुंचे! उनकी खोजी पत्रकारिता के कारण ही सीता माता मिले, वहां भी अपनी खबर की पुष्टि करने के लिए उन्‍होंने बकायदा प्रमाण प्रस्‍तुत किए, न सिर्फ प्रमाण दिए बल्कि अपनी सूचना को भगवान राम के समक्ष पूरी पुष्टि के  साथ प्रस्‍तुत करने के लिए कुछ प्रमाण लिए, यह श्रेष्‍ठ पत्रकार का संकल्‍प होना चाहिए ! उनका कहना था कि अपने टास्‍क के प्रति हनुमानजी इतने संकल्‍पबद़ध थे कि रास्‍ते में कहीं भी दिग्‍भ्रमित नहीं हुए, आज के पत्रकार को भी शायद अपना लक्ष्‍य चुन लेना चाहिए कि उसे कौनसा पत्रकार बनना है !
मेरा यह आलेख बहुत संक्षिप्‍त है लेकिन मैं चाहता हूं कि इस पर आप अपना विचार रखे कि श्रेष्‍ठ पत्रकारिता के क्‍या लक्षण हैं

Tuesday, December 9, 2008

वाह रे राजस्‍थानी जनता ?

वाह रे जनता, क्‍या कमाल किया है, सच में लोकतंत्र बहाल किया है, किसी को रंक बनाया तो किसी को राजशाही पर लटकाया है, लटकाया है क्‍योंकि न हराया और जिताया है, बस चंद कदम दूर बिठाया है, पांच साल तक डरते रहेंगे, घबराते रहेंगे, कुछ तो काम करते रहेंगे, जिसने स्‍वयं को सामंतशाही कहा उसे फिर घर बिठाया है और जो सत्‍ता में कोर कसर निकाल रहे थे, शेखी बघार रहे थे उन्‍हें फिर सत्‍ता पर बिठाया है ताकि पांच साल बाद उनसे हिसाब लिया जा सके, बोल मुन्‍ना तूने क्‍या कहा था और क्‍या कर दिखाया है, जनता की इस अदालत में फिर होगा हिसाब, बस पांच साल बाद| राजस्‍थान की धरा पर हर बार ऐसा हुआ है, जनता ने कभी इसे और कभी उसे राजप्रसाद दिया है | एक ने कहा था अब नहीं रुकेगा राजस्‍थान और दूसरे ने कहा अब नहीं झुकेगा राजस्‍थान| जनता फिर देखेगी कहां जाएगा राजस्‍थान? जिसने खजाना खाली बताया था उसे बाहर कर दिया था और जिसने खजाना भरा बताकर अपनो पर लुटाया, साथियों ने उसी खजाने को घर का बनाया, उन्‍हें भी जनता ने झटका लगाया | आरक्षण की राजनीति लील गई सरकार को, घडसाना की गोली दाग गई सरकार को, बेरोजगारों पर महिलाओं पर चली लाठी चल गई खुद सरकार पर यह आक्रोश था या फिर सत्‍ता पाने की जुगत में हार कि लाखों को दिया रोजगार भी काम नहीं आया, कर्मचारियों पर लुटाया खजाना भी कुछ कर नहीं पाया बात चिंता की है क्‍योंकि सरकार ने वो सब कुछ किया था जिससे सत्‍ता वापस आती है लेकिन नहीं आई खुद भाजपा ने कोई कसर नहीं छोडी विकास के साथ साथ मुम्‍बई धमाकों को खूब भुनाया था अखबारों में 25 नवम्‍बर तक विकास की बात करने वाले विज्ञापन अचानक मुम्‍बई पर केंद्रित हो गए थे लगता था खून की होली खेलने वाले आतंककारियों की खिलाफत के लिए भाजपा का केसरिया लहराएगा, नहीं लहराया तो क्‍या माने? जनता दोनों को दोषी मानती है या फिर बस पांच साल का हिसाब चाहती है, चिंता इस बात की भी है कि पार्टी की राजनीति तो कहीं सत्‍ता नहीं बदल रही, अपनों ने ही नाराज होकर तो कहीं सत्‍ता को घर का  रास्‍ता नहीं दिखा दिया, कहीं ऐसा तो नहीं कि  जनता  जो चाहती थी, वो राजनेताओं की व्‍यक्तिगत कुंठाओं और स्‍वार्थ के कारण संभव नहीं हो सका| यह सवाल उचित है कि सरकार गई है या फिर चाहकर भी नहीं  बनी है, उत्‍तर कुछ भी हो अगली जिम्‍मेदारी नई सरकार की है फिर यह दिन लौटेंगे राजा को रंक बना सकते हैं, इसी चिंता में कुछ कर कांग्रेस अपने पांच वर्ष गुजार सकते हैं, कुछ किया तो वापस आ सकते हैं, शीला दीक्षित का चित्र मन मस्तिष्‍क में बिठा सकते हैं, जहां न आतंकवाद का असर था और न आरोपों का, काम किया तो जीते, कुछ ऐसा ही मध्‍यप्रदेश भी रहा, खैर आप चिंतन करे कि क्‍या कारण रहे कि राजस्‍थान में वसुंधरा राजे मुख्‍यमंत्री से पूर्व मुख्‍यमंत्री हो गई| उम्‍मीद है आप विचार देंगे कि राजस्‍थान में सत्‍ता परिवर्तन के क्‍या कारण ?

Monday, December 8, 2008

अपनी बात जरूर कहें

यह ब्‍लॉग आप सभी के लिए हैं, मेरा मानना है कि मन की बात कहने से दर्द कुछ कम हो जाता है, यहां मेरा आशय किसी भी स्‍तर पर मन की भडास निकालने से नहीं है, भडास ही निकालनी है तो अकेले व बंद कमरे में आंखे बंद करके चि‍त्‍त को शांत करके निकालो, लेकिन आप किसी भी बात से आहत है, किसी का काम गलत लगे, बात गलत लगे तो अपने विचार इस ब्‍लॉग पर दे सकते हैं, बात व्‍यवस्‍था की हो या फिर आसपास की हम बात करेंगे तो बहुत कुछ चिंतन कर सकेंगे
मुझे उम्‍मीद है कि आपके मन की बात यहां जरूर आएगी

Sunday, December 7, 2008

आखिर किस पार्टी के साथ जाएं

देशभर में इन दिनों दो मुद़दों की चर्चा है एक मुम्‍बई में हुए बम धमाके और दूसरे पांच राज्‍यों में हो रहे विधानसभा चुनाव, न जाने क्‍यों मुझे दोनों ही मामलों में राजनेताओं की राजनीति समझ नहीं आती, मुम्‍बई बम धमाकों के बाद पार्टियों से जुडे नेता अपना अपना दामन साफ बताने में जुट गए और बचे हुए नेता इन्‍हीं पांच प्रदेशों में घूमकर एक दूसरे पर आतंकवाद को बढावा देने का आरोप मढते रहे, पिछले  दिनों मुझे अपनी बात कहने का अवसर मिला, तभी पता चला कि राजनेता कोई भी सच्‍ची बात सुनकर किस तरह बिफर जाते है, मौका था बीकानेर में भाजपा प्रत्‍याशी गोपाल जोशी की सभा को संबोधित करने आए भाजपा के पूर्व राष्‍टीय अध्‍यक्ष वैंकया नायडू से मिलने का, नायडू ने पहले अपनी बात कही, भाजपा की जमकर तारीफ की और आदत के मुताबिक कांग्रेस का परम्‍परागत विरोध किया
आतंकवाद के मुद़दे पर नायडू ने कहा कि मुम्‍बई में हुई घटना आतंकवाद की पराकाष्‍ठा है, मेरा सवाल है कि अगर मुम्‍बई में हुई घटना को आतंकवाद की पराकाष्‍ठा कहा जाए तो संसद पर जो कुछ हुआ उसे क्‍या कहा जाएगा, मुम्‍बई की घटना निश्चित रूप से देश के लिए शर्मनाक है, अब तक की सबसे बडी आतंकवादी घटना है, इसके बाद भी देश की संसद पर  हमला होना ही पराकाष्‍ठा कहा जाएगा, यह मेरा व्‍यक्तिगत विचार है, नायडू अपनी बात जनता के बीच कहते हुए संसद पर हुए हमले की बात क्‍यों नहीं करते, इतना ही नहीं नायडू से जब पत्रकारों ने यह पूछा कि अगर मुम्‍बई घटना के लिए केंद्र सरकार की घेराबंदी भाजपा कर रही है तो आतंककारियों को हवाई जहाज में बिठाकर छोडने वालों के साथ क्‍या होना चाहिए? इस सवाल पर नायडू ऐसे बिफरे जैसे पत्रकारों ने उनको पर्सनल एकाउंट की जमा राशि पूछ ली है, दो तीन सवाल बाद तो नायडू ने आपा ही खो दिया, उन्‍होंने यहां तक कह दिया कि पत्रकारों को सवाल पूछने के लिए नहीं बुलाया गया, हालांकि इसके बाद भी नायडू अपनी बात कहते रहे और पत्रकार सवाल पूछने के धर्म को निभाते रहे
आतंकवाद के मामले में कांग्रेस को भी साफ सुधरा नहीं कहा जा सकता, आश्‍चर्य की बात है कि जब देश आतंकवाद से जल रहा था, शहीदों चिता अभी ठण्‍डी भी नहीं हुई कि महाराष्‍ट से दिल्‍ली तक सियासत का खेल शुरू हो गया, मुख्‍यमंत्री से देश के गहमंत्री तक पहुंचने की लडाई सडक पर आ गई, न बनने वाले न विरोध करने वाले सोचा कि शहीद होने वालों का उद़देश्‍य राजनीति नहीं बल्कि आतंक के राज को समाप्‍त करना था,
मेरा सवाल है कि आखिर देश की दो प्रमुख पार्टियां जब सरे राह इस गंभीर मामले में अलग अलग बयान दे रही है तो देश का आम आदमी आखिर किससे सुरक्षा मांगे, 
उम्‍मीद है कि आप इस सवाल का जवाब अवश्‍य देंगे