चीन के राष्ट्रपति भारत यात्रा पर है। वो नई दिल्ली के बजाय गुजरात के अहमदाबाद पहुंचे। जहां पहली बार किसी राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत हुआ। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति भी पहुंचे लेकिन तब वो उस पद पर नहीं थे। दिल्ली के बजाय अन्यत्र किसी राष्ट्राध्यक्ष का यह संभवत: पहला अवसर होगा। वैसे यह चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए हमारे प्रधानमंत्री को जैसा उचित लगे, वैसा उनको करना चाहिए। फिलहाल प्रधानमंत्री ने उन्हें गुजरात में आमंत्रित किया है क्योंकि वर्तमान में चीन से मिलने वाली सभी तरह की सहायताएं गुजरात को ही समर्पित होने वाली है। चीन के राष्ट्रपति तोहफे के रूप में जो योजनाएं गुजरात में लाए हैं, उन पर करीब अरबों रुपए चीन ही खर्च करेगा जबकि अधिकार गुजरात सरकार का होगा। नरेंद्र मोदी का यह प्रयास निश्चित रूप से बेहतर है। चूंकि वो गुजरात के हैं, इसलिए उनका गुजरात के प्रति विशेष लगाव होना स्वभाविक है। किसी भी राज्य को यह अतिरिक्त स्नेह मिलना चाहिए। चीन राष्ट्रपति के आगमन पर जिन मुद्दों पर सर्वाधिक चर्चा होनी चाहिए, वो है सीमा पर हो रही घुसपैठ पर। एक तरफ चीनी राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर पहुंचे हैं और दूसरी तरफ हमारे ही सौ सैनिकों को वहां बंधक बना लिया गया। एक ओर जहां चीन से हम गुजरात में सहयोग ले रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सीमा पर खानाबदोशों के साथ मिलकर चीनी सेना हमारी ही जमीन से हमें उखाडऩे की कोशिश कर रही है। पिछले दिनों जापान यात्रा के दौरान जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन की खिलाफत करने का संकेत दिया था, उससे आभास हुआ कि चीन को कड़ा जवाब देने की कोशिश होगी। इसके विपरीत सीमा पर मोदी सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही है। न तो पाकिस्तान की सीमा पर घुसपैठ रुक पा रही है और न ही चीन की सीमा पर। आखिर क्या कारण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारें सीमा पर इतना कमजोर साबित होती है। निश्चित रूप से युद्ध करना न तो हमारे लिए लाभदायी है और न ही चीन-पाकिस्तान के लिए। इसके बाद भी हमें ठोस कदम तो उठाना ही पड़ेगा। इन दिनों जब चीनी राष्ट्रपति हमारे मेहमान है, तब उन्हें बताना चाहिए कि किस तरह से हमारे शहरों पर चीन का प्रभाव बढ़ता जा रहा है? किस तरह हमारी सेनाओं को सीमा पर परेशान किया जा रहा है? यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि चीन को व्यापारिक दृष्टि से भारत की जरूरत है। चीन और भारत साथ मिलकर ही आगे बढ़ सकते हैं। अगर दोनों में खटास होगी तो दोनों का विकास रुकेगा। खुद चीनी राष्ट्रपति ने भारत के एक समाचार पत्र में इस आशय का आलेख लिखा है। हमारा बाजार चीन से कमजोर नहीं है, खरीद की शक्ति कम नहीं है। ऐसे में चीन को स्पष्ट करना चाहिए कि अगर वो हमारे देश में अपना उत्पाद बेचना चाहता है तो उसे हमारे से सौहार्दपूर्ण संबंध रखने होंगे। अगर चीन यह सोचता है कि वो दादागिरी करके आगे बढ़ सकता है तो इस मामले में प्रधानमंत्री को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
Sunday, September 21, 2014
चीनी को दिखानी होगी हमारी ताकत
Saturday, June 1, 2013
इस हमाम में सारे एक जैसे हैं क्या?
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के भविष्य का फैसला रविवार को हो जाएगा। पिछले दिनों स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आते ही उनकी प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़े होने शुरू हो गए थे। बाद में जब इस भ्रष्टाचार की जड़ बेटी के ससुराल में ही मिली तो लोगों ने साफ कह दिया कि श्रीनिवासन को हटाया जाना चाहिए। ससुर की शह के बिना दामाद मयप्पन की हिम्मत नहीं होती कि वो किसी सट्टेबाज के सम्पर्क में आ जाए। संभव नहीं है फिर भी माने लेते हैं कि श्रीनिवासन को इस पूरे मामले के बारे में जानकारी ही नहीं थी। उनके दामाद पीठ पीछे गोरखधंधा कर रहे थे या फिर संपर्क बनाने के चक्कर में गलत फंस गए। इसके बाद भी यह सबसे बड़ा सत्य है कि श्रीनिवासन के दामाद स्पॉट फिक्सिंग में फंसे हुए हैं। कुछ न कुछ गड़बड़ हुआ है तभी दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया। ऐसे में मामले की जांच होनी चाहिए, जिसके आदेश स्वयं श्रीनिवासन ने दिए हैं। फिर वो नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र देने में संकोच क्यों कर रहे हैं? उनके रहते हुए जांच निष्पक्ष हो पाएगी, ऐसा संभव नहीं है। ऐसे में श्रीनिवासन को दूर रहते हुए पूरी जांच में सहयोग करना चाहिए। बीसीसीआई के पदाधिकारियों की ओर से त्यागपत्र देने का सिलसिला भले ही राजनीतिक आधार पर है, लेकिन यह स्वागत योग्य कदम है। इससे दबाव बनेगा और उसी दबाव में श्रीनिवासन त्यागपत्र देंगे। यह पद पर बने रहने की लोलुपता ही है कि केंद्रीय मंत्रियों, कांग्रेस नेताओं सहित कई बड़े खिलाडिय़ों के साफ साफ बोलने के बाद भी श्रीनिवासन इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। दरअसल, जहां धन और पद दोनों का सामंजस्य है, वहां बैठा आदमी किसी भी स्थिति में हटना नहीं चाहता। देश के सबसे धनवान खेल क्रिकेट से जुड़े संघों पर कब्जा करने के बाद कोई हटना नहीं चाहता। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि भाजपाई नेता भी इस मुद्दे पर शांत है। कांग्रेसी नेता तो शायद अपनी पार्टी की इज्जत के लिए नहीं बोल रहे लेकिन भाजपा नेताओं की जुबान पर ताला क्यों पड़ा है। खासकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की मजबूत कड़ी अरुण जेटली की चुप्पी क्रिकेट भ्रष्टाचार की मौन कहानी पर हकीकत की मोहर लगाती दिखती है। ऐसा लगता है कि हमाम में सब नंगे हैं। श्रीनिवासन के त्यागपत्र देने के बाद भी क्या मामले की निष्पक्ष जांच हो पाएगी?
Sunday, May 26, 2013
यह कैसा नक्सलवाद ?
पश्चिम बंगाल में एक जगह है नक्सलबाड़ी। वहां के किसानों ने अपनी मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया तो नक्सलबाड़ी के लोग नक्सलवादी हो गए। जिन लोगों ने आंदोलन की शुरूआत की थी, उन्होंने कभी यह तय नहीं किया था कि निहत्थे लोगों पर हमला करेंगे। कोई नेता सामने आएगा तो उसका सीना छनली कर देंगे। कोई पुलिसकर्मी सामने आया तो इतनी गोलियां उसके सीने में ठोक देंगे कि कोई गिन भी नहीं पाए। दरअसल, नक्सलवाद की पहचान इस स्याह हकीकत से बहुत दूर थी। मांग करने का हर किसी को अधिकार है, लोकतंत्र जब प्रधानमंत्री का पुतला जलाने की अनुमति दे सकता है तो महेंद्र कर्मा का भी पुतला जलाया जा सकता था। कुछ समय बाद वहां चुनाव होने वाले हैं और कांग्रेस को जबर्दस्त वोटो से हराकर विरोध जताया जा सकता था। पहले दंतेवाड़ा और अब सुकमा में जो कुछ भी हुआ, वो नक्सलवाद या किसी आंदोलन का सही चेहरा नहीं है।
कुछ लोग नक्सलवाद को मार्क्सवाद-लेनिनवाद का रूप मानते हैं लेकिन हकीकत में मार्क्स और लेनिन में से किसी ने भी हत्या करके ध्यान आकृष्ट करने का रास्ता अपनाने की सलाह नहीं दी है। इन लोगों ने तरीके से आंदोलन चलाने का समर्थन किया है, कायरों की तरह पीछे से वार करने का ज्ञान तो उन्होंने कभी दिया ही नहीं। ऐसे में दंतेवाड़ा और अब सुकमा की घटना ने साफ कर दिया है कि नक्सलवाद ने अपना चेहरा बदल लिया है। यह सही है कि नक्सली क्षेत्रों का विकास देश के विकास की तुलना में बहुत कम हुआ है। इसका कारण ढूंढना पड़ेगा। सिर्फ सरकार को दोषी ठहराने से समस्या का हल नहीं होना। केंद्र में स्थापित रही कांग्रेस और पूर्व में रही भाजपा की सरकार ने कभी नहीं चाहा कि नक्सलवाद उग्रवाद के रूप में सामने आए या फिर देश का कोई हिस्सा इस तरह पिछड़ा रह जाए। हकीकत तो यह है कि सभी सरकारें चाहती है कि नक्सलवाद, माओवाद का हल निकले। क्यों नहीं निकल रहा है, इस पर चिंतन करने की जरूरत है। कौनसी ताकतें हैं जो सरकार और माओवादियों के बीच वार्ता के हालात ही पैदा नहीं होने दे रही।
यह कैसी राजनीति
आखिर माओवादियों की यह कैसी राजनीति है कि वो किसी से बात करने के लिए तैयार नहीं है और बात करते भी है ऐसी दस शर्तें पहले से साथ रखते हैं, जिनकी पूर्ति होना संभव नहीं है। परिवार में रहने वाले चार भाईयों में एक सक्षम और दूसरा गरीब हो सकता है, विवाद भी हो सकते हैं, लेकिन खून का रास्ता अख्तियार करने वाला अगर गरीब भी है तो समाज उसे दुत्कारता है। नक्सलियों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। वो जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उस पर किसी का समर्थन नहीं मिलने वाला।
एक सीमा तक सहन
नक्सलवाद को सामाजिक उत्पीड़न के कारण उपजा रोग बताया जाता रहा है। काफी हद तक यह सही है कि जिन लोगों को आजाद देश में सुविधाएं नहीं मिलेगी, वो आंदोलन करेगा। उनका आंदोलन जायज है। यह आंदोलन एक लम्बे इंतजार और संघर्ष के बाद खड़ा हुआ। खून खराबे की स्थिति शायद पूरी तरह निराशा का भाव आने के बाद शुरू हुआ दौर है। नक्सलियों को सोचना चाहिए कि अब आम जनता उनसे त्रस्त है, परेशान है, उनके सब्र का बांध भी धीरे धीरे टूट रहा है। यही कारण है कि बस्तर में नक्सलियों का जोरदार विरोध करने वाला महेंद्र कर्मा वहां टाइगर रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गया। नक्सलियों को भी यह भय सता रहा है कि उनके सामने विरोध की एक और सत्ता खड़ी हो रही है। इसी सत्ता को जवाब देने के लिए कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला किया गया। महेंद्र कर्मा को मारना ही नक्सलियों का मुख्य उद़देश्य था। चूंकि कर्मा को कांग्रेस ने पनाह दी थी, इसलिए उस पार्टी के अध्यक्ष का खात्मा करना नक्सलियों के ज्यादा सुखद था। उन्होंने ऐसा करके अपना अहं तो दिखा दिया लेकिन नक्सलवाद के अंतस में बैठे आंदोलन को इससे धक्का लगना अब तय हो गया है। धीरे धीरे नक्सलवाद और माओवाद के प्रति गरीब और मध्यम वर्ग की जो आस्था थी, वो खत्म हो रही है।
कट़टरवाद से लड़ेगी सरकार
इस घटना के बाद खालिस्तान की जंग याद आती है। जब सरकार ने तय कर लिया कि इसे खत्म करना है तो कर दिया गया। यह नक्सलवादी भी जानते हैं कि सरकार उनके हथियारों के कारण नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के कारण जवाबी हमला करने से बचती है। जिस दिन समाज का तानाबाना टूटता नजर आएगा तब शायद सरकार की सख्ती बढ़ जाएगी। ऐसे में इस कट़टवार को खत्म करने के लिए गोलियां चली तो किसी की संवेदना भी शायद नक्सलियों के प्रति नहीं रहेगी। बेहतर होगा कि आम और अनजान भारतीयों को नक्सलवाद एक आंदोलन के रूप में ही दिखाई दें, आतंकवाद की तरह नहीं।
दोनों सरकारें जिम्मेदार
इस घटना के बाद राज्य और केंद्र सरकार एक दूसरे पर आरोप लगा रही है। हकीकत में दोनों ही सरकारें इस घटना के लिए जिम्मेदार है। खुफिया तंत्र केंद्र सरकार के इशारे पर चलता है। क्या कारण थे कि उनके ही नेताओं पर हमले की सूचना नहीं पहुंची। दरअसल, चार दिन की गंभीरता के बाद सरकार और प्रशासन आतंकवाद और नक्सलवाद को भूल जाती है।
कुछ लोग नक्सलवाद को मार्क्सवाद-लेनिनवाद का रूप मानते हैं लेकिन हकीकत में मार्क्स और लेनिन में से किसी ने भी हत्या करके ध्यान आकृष्ट करने का रास्ता अपनाने की सलाह नहीं दी है। इन लोगों ने तरीके से आंदोलन चलाने का समर्थन किया है, कायरों की तरह पीछे से वार करने का ज्ञान तो उन्होंने कभी दिया ही नहीं। ऐसे में दंतेवाड़ा और अब सुकमा की घटना ने साफ कर दिया है कि नक्सलवाद ने अपना चेहरा बदल लिया है। यह सही है कि नक्सली क्षेत्रों का विकास देश के विकास की तुलना में बहुत कम हुआ है। इसका कारण ढूंढना पड़ेगा। सिर्फ सरकार को दोषी ठहराने से समस्या का हल नहीं होना। केंद्र में स्थापित रही कांग्रेस और पूर्व में रही भाजपा की सरकार ने कभी नहीं चाहा कि नक्सलवाद उग्रवाद के रूप में सामने आए या फिर देश का कोई हिस्सा इस तरह पिछड़ा रह जाए। हकीकत तो यह है कि सभी सरकारें चाहती है कि नक्सलवाद, माओवाद का हल निकले। क्यों नहीं निकल रहा है, इस पर चिंतन करने की जरूरत है। कौनसी ताकतें हैं जो सरकार और माओवादियों के बीच वार्ता के हालात ही पैदा नहीं होने दे रही।
यह कैसी राजनीति
आखिर माओवादियों की यह कैसी राजनीति है कि वो किसी से बात करने के लिए तैयार नहीं है और बात करते भी है ऐसी दस शर्तें पहले से साथ रखते हैं, जिनकी पूर्ति होना संभव नहीं है। परिवार में रहने वाले चार भाईयों में एक सक्षम और दूसरा गरीब हो सकता है, विवाद भी हो सकते हैं, लेकिन खून का रास्ता अख्तियार करने वाला अगर गरीब भी है तो समाज उसे दुत्कारता है। नक्सलियों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। वो जिस रास्ते पर चल रहे हैं, उस पर किसी का समर्थन नहीं मिलने वाला।
एक सीमा तक सहन
नक्सलवाद को सामाजिक उत्पीड़न के कारण उपजा रोग बताया जाता रहा है। काफी हद तक यह सही है कि जिन लोगों को आजाद देश में सुविधाएं नहीं मिलेगी, वो आंदोलन करेगा। उनका आंदोलन जायज है। यह आंदोलन एक लम्बे इंतजार और संघर्ष के बाद खड़ा हुआ। खून खराबे की स्थिति शायद पूरी तरह निराशा का भाव आने के बाद शुरू हुआ दौर है। नक्सलियों को सोचना चाहिए कि अब आम जनता उनसे त्रस्त है, परेशान है, उनके सब्र का बांध भी धीरे धीरे टूट रहा है। यही कारण है कि बस्तर में नक्सलियों का जोरदार विरोध करने वाला महेंद्र कर्मा वहां टाइगर रूप में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो गया। नक्सलियों को भी यह भय सता रहा है कि उनके सामने विरोध की एक और सत्ता खड़ी हो रही है। इसी सत्ता को जवाब देने के लिए कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हमला किया गया। महेंद्र कर्मा को मारना ही नक्सलियों का मुख्य उद़देश्य था। चूंकि कर्मा को कांग्रेस ने पनाह दी थी, इसलिए उस पार्टी के अध्यक्ष का खात्मा करना नक्सलियों के ज्यादा सुखद था। उन्होंने ऐसा करके अपना अहं तो दिखा दिया लेकिन नक्सलवाद के अंतस में बैठे आंदोलन को इससे धक्का लगना अब तय हो गया है। धीरे धीरे नक्सलवाद और माओवाद के प्रति गरीब और मध्यम वर्ग की जो आस्था थी, वो खत्म हो रही है।
कट़टरवाद से लड़ेगी सरकार
इस घटना के बाद खालिस्तान की जंग याद आती है। जब सरकार ने तय कर लिया कि इसे खत्म करना है तो कर दिया गया। यह नक्सलवादी भी जानते हैं कि सरकार उनके हथियारों के कारण नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के कारण जवाबी हमला करने से बचती है। जिस दिन समाज का तानाबाना टूटता नजर आएगा तब शायद सरकार की सख्ती बढ़ जाएगी। ऐसे में इस कट़टवार को खत्म करने के लिए गोलियां चली तो किसी की संवेदना भी शायद नक्सलियों के प्रति नहीं रहेगी। बेहतर होगा कि आम और अनजान भारतीयों को नक्सलवाद एक आंदोलन के रूप में ही दिखाई दें, आतंकवाद की तरह नहीं।
दोनों सरकारें जिम्मेदार
इस घटना के बाद राज्य और केंद्र सरकार एक दूसरे पर आरोप लगा रही है। हकीकत में दोनों ही सरकारें इस घटना के लिए जिम्मेदार है। खुफिया तंत्र केंद्र सरकार के इशारे पर चलता है। क्या कारण थे कि उनके ही नेताओं पर हमले की सूचना नहीं पहुंची। दरअसल, चार दिन की गंभीरता के बाद सरकार और प्रशासन आतंकवाद और नक्सलवाद को भूल जाती है।
Thursday, August 9, 2012
बाबा से उम्मीद की मजबूरी
बाबा रामदेव पिछले कुछ दिनों से फिर चर्चा में है। पहले बाबा रामदेव, फिर अन्ना हजारे। बाबा औरतों के कपड़े पहनकर मैदान से भाग गए थे और बाबा रामदेव राजनीति को विकल्प बताते हुए अपनी ही टीम को भंग कर चुके हैं। इसके बाद भी भारतीय जन और जनतंत्र की मजबूरी है कि इन लोगों पर भरोसा करना पड़ेगा। दरअसल, बाबा और अन्ना ने जिन विषयों के आधार पर जनता की नब्ज पकड़ी है, वो सटीक है। भ्रष्टाचार और काला धन वापस लाने का अभियान देश की आजादी का दूसरा अभियान कहा जा सकता है। इसके बाद भी यह सोचने की जरूरत है कि आखिर क्या इस मुहिम के बाद देश दोबारा आजाद हो सकेगा। दरअसल, रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर भीड़ के रूप में खड़े होने वाले चेहरों से ही सब कुछ नहीं बदलने वाला। बदलने के लिए तो आम जन में विश्वास जगाना पड़ेगा। फिलहाल बाबा और अन्ना जो कर रहे हैं वो सड़क पर तमाशा दिखाने वालों के पास एकत्र होने वाली भीड़ जैसा है। तमाशा वाला जान जोखिम में डालकर कई करतब दिखाता है तो हम उनकी गरीबी और करतब की गंभीरता को देखते हुए एक या दो रुपए उसकी झोली में डाल देते हैं। जैसे ही करतब से हटते हैं, उस गरीब के बारे में सोचना बंद कर देते हैं। ठीक वैसे ही हम अन्ना और बाबा के आंदोलन से एंटरटेनमेंट महसूस कर रहे हैं। पिछले डेढ़ वर्ष में आखिर किस शख्स ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की तैयारी की है।
बाबा रामदेव ने साफ कर दिया कि वो राजनीतिक पार्टी में रुचि नहीं रखते ऐसे में उन्हें साफ करना होगा कि उनके आंदोलन का चरण क्या होगा। यह भी बताना होगा कि अगर सरकार उनके अनशन और आंदोलन से नहीं मानेगी (जिसकी शत प्रतिशत उम्मीद है) तो वो क्या करेंगे। दस दिन का खेल दिखाकर आश्रम जाएंगे या फिर सरकार खदेड़ेगी तो लड़कियों के कपड़े पहनकर भाग निकलेंगे। अगर नहीं तो आखिर किस तरह उनका आंदोलन चलेगा। दरअसल, जनता जिन लोगों पर विश्वास करना शुरू करती है, वो ही बाद में धोखा दे जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे अन्ना ने पिछले दिनों दिया। जनता से दो दिन में एसएमएस करने की राय पूछी, हजारों लोगों ने छह छह रुपए के एसएमएस टीवी चैनलों और स्वयं अन्ना को किए लेकिन उसका विश्लेषण करने से पहले ही टीम अन्ना अन्ना पार्टी बन गई। जब पार्टी बनानी ही थी तो लोगों के एसएमएस क्यों खराब करवाए। इसी तरह बाबा रामदेव भी कुछ करेंगे, ऐसी आशंका से इनकार करने का कारण नहीं है। बाबा रामदेव को अपने आंदोलन का हर चरण्ा स्पष्ट करना होगा। हार हुई तो ऐसे, जीत हुई तो ऐसे करेंगे। देश की आजादी डेढ़ साल में नहीं मिली थी। एक शतक वर्ष में जाकर यह सपना पूरा हो पाया। वो भी तब जब अंग्रेज इस देश से हार चुके थे, छोड़ना चाहते थे। इसके विपरीत जिस दूसरी आजादी की बात कर रहे हैं, वहां भ्रष्ट नेता न तो अंग्रेजों की तरह छोड़ना चाह रहे हैं और न उनके लिए कोई विपरीत स्थिति बन पाई है। ऐसे में आंदोलन में बार बार होने वाली हार तो सहन हो सकती है लेकिन अन्ना की तरह मैदान छोड़कर भागने की नीति अब भारत की जनता शायद सहन नहीं कर पाए।
आंदोलन में अंतर
अन्ना और बाबा रामदेव के आंदोलन में एक बड़ा अंतर है। वो यह कि अन्ना के पास अपनी एक टीम है और वो लगभग पूरे देश में सक्रिय है। ऐसे में बाबा का नेटवर्क बड़ा और सुव्यवस्थित है। इसके विपरीत अन्ना के पास अपनी टीम के अलावा कोई कसावटभरा नेटवर्क नहीं था। इसी कारण उन्हें कम भीड़ और बाद में उपेक्षा जैसी सच्चाई से सामना करना पड़ा। बाबा रामदेव को यह समस्या नहीं है। देश के अधिकांश हिस्सों से उनके एक इशारे पर हजारों लोग पहुंच सकते हैं। अगर उनके आंदोलन में सच्चाई रही तो दूसरे लोग भी उनसे जुड़ेंगे और आंदोलन को सफलता की राह पर ले जाएंगे।
सरकार नहीं है गंभीर
अन्न की तरह बाबा के आंदोलन को लेकर भी केंद्र सरकार गंभीर नहीं दिख रही। दरअसल, अन्ना के विफल आंदोलन के बाद सरकार के हौंसले बुलंद है और उन्हें लगता है कि बाबा रामदेव भी आठ दस दिन बाद अपने आप चले जाएंगे। ऐसे में आंदोलन लम्बा चल सकता है जिसके लिए बाबा टीम को तैयार रहना चाहिए।
परिणाम मिलना जरूरी नहीं
बाबा को यह सोचकर भी आंदोलन नहीं करना चाहिए कि उन्हें शत प्रतिशत परिणाम इस बार ही मिल जाएगा। निश्चित रूप से इसमें विलम्ब हो सकता है लेकिन तब तक के लिए इंतजार करना चाहिए। आंदोलन को पहले चरण में ही साफ कर दिया जाना चाहिए कि अगर मांगे नहीं मानी गई तो फलां तारीख से यह निर्णय होगा।
बाबा रामदेव ने साफ कर दिया कि वो राजनीतिक पार्टी में रुचि नहीं रखते ऐसे में उन्हें साफ करना होगा कि उनके आंदोलन का चरण क्या होगा। यह भी बताना होगा कि अगर सरकार उनके अनशन और आंदोलन से नहीं मानेगी (जिसकी शत प्रतिशत उम्मीद है) तो वो क्या करेंगे। दस दिन का खेल दिखाकर आश्रम जाएंगे या फिर सरकार खदेड़ेगी तो लड़कियों के कपड़े पहनकर भाग निकलेंगे। अगर नहीं तो आखिर किस तरह उनका आंदोलन चलेगा। दरअसल, जनता जिन लोगों पर विश्वास करना शुरू करती है, वो ही बाद में धोखा दे जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे अन्ना ने पिछले दिनों दिया। जनता से दो दिन में एसएमएस करने की राय पूछी, हजारों लोगों ने छह छह रुपए के एसएमएस टीवी चैनलों और स्वयं अन्ना को किए लेकिन उसका विश्लेषण करने से पहले ही टीम अन्ना अन्ना पार्टी बन गई। जब पार्टी बनानी ही थी तो लोगों के एसएमएस क्यों खराब करवाए। इसी तरह बाबा रामदेव भी कुछ करेंगे, ऐसी आशंका से इनकार करने का कारण नहीं है। बाबा रामदेव को अपने आंदोलन का हर चरण्ा स्पष्ट करना होगा। हार हुई तो ऐसे, जीत हुई तो ऐसे करेंगे। देश की आजादी डेढ़ साल में नहीं मिली थी। एक शतक वर्ष में जाकर यह सपना पूरा हो पाया। वो भी तब जब अंग्रेज इस देश से हार चुके थे, छोड़ना चाहते थे। इसके विपरीत जिस दूसरी आजादी की बात कर रहे हैं, वहां भ्रष्ट नेता न तो अंग्रेजों की तरह छोड़ना चाह रहे हैं और न उनके लिए कोई विपरीत स्थिति बन पाई है। ऐसे में आंदोलन में बार बार होने वाली हार तो सहन हो सकती है लेकिन अन्ना की तरह मैदान छोड़कर भागने की नीति अब भारत की जनता शायद सहन नहीं कर पाए।
आंदोलन में अंतर
अन्ना और बाबा रामदेव के आंदोलन में एक बड़ा अंतर है। वो यह कि अन्ना के पास अपनी एक टीम है और वो लगभग पूरे देश में सक्रिय है। ऐसे में बाबा का नेटवर्क बड़ा और सुव्यवस्थित है। इसके विपरीत अन्ना के पास अपनी टीम के अलावा कोई कसावटभरा नेटवर्क नहीं था। इसी कारण उन्हें कम भीड़ और बाद में उपेक्षा जैसी सच्चाई से सामना करना पड़ा। बाबा रामदेव को यह समस्या नहीं है। देश के अधिकांश हिस्सों से उनके एक इशारे पर हजारों लोग पहुंच सकते हैं। अगर उनके आंदोलन में सच्चाई रही तो दूसरे लोग भी उनसे जुड़ेंगे और आंदोलन को सफलता की राह पर ले जाएंगे।
सरकार नहीं है गंभीर
अन्न की तरह बाबा के आंदोलन को लेकर भी केंद्र सरकार गंभीर नहीं दिख रही। दरअसल, अन्ना के विफल आंदोलन के बाद सरकार के हौंसले बुलंद है और उन्हें लगता है कि बाबा रामदेव भी आठ दस दिन बाद अपने आप चले जाएंगे। ऐसे में आंदोलन लम्बा चल सकता है जिसके लिए बाबा टीम को तैयार रहना चाहिए।
परिणाम मिलना जरूरी नहीं
बाबा को यह सोचकर भी आंदोलन नहीं करना चाहिए कि उन्हें शत प्रतिशत परिणाम इस बार ही मिल जाएगा। निश्चित रूप से इसमें विलम्ब हो सकता है लेकिन तब तक के लिए इंतजार करना चाहिए। आंदोलन को पहले चरण में ही साफ कर दिया जाना चाहिए कि अगर मांगे नहीं मानी गई तो फलां तारीख से यह निर्णय होगा।
Saturday, August 4, 2012
क्या टीम अन्ना हार गई ?
अन्ना हजारे ने सोलह महीने पहले जो आंदोलन किया था, उसका अंत हो गया या फिर दूसरा चरण शुरू हो गया है। मेरा मानना है कि आंदोलन का दूसरा चरण शुरू हो गया है। इसका आशय यह कतई नहीं है कि मैं पहले चरण को सफल मान रहा हूं। मेरा मानना है कि पहले चरण की विफलता के बाद दूसरे चरण में संभावना तलाशी जा रही है। ऐसा स्वयं अन्ना और उनकी टीम भी स्वीकार कर चुकी है कि वो पहले चरण में हारने के बाद अब दूसरे चरण में प्रवेश कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब पहला चरण हार ही गए तो दूसरे चरण की जरूरत ही क्या है। अन्ना अपने राणेगाव सिद्वि में काम संभालें और अरविन्द अपने कर विभाग को सेवाएं दें। जहां तक संभव हो लड़े। बाकी सदस्य भी अपना रास्ता नापें। दरअसल, इस आंदोलन को लेकर देशभर में भारतीय भावनाएं जागी थी। दरअसल, अन्ना ने अपने गांव और महाराष्ट में भ्रष्टाचार के खिलाफ अच्छा काम किया था। इसलिए उम्मीद जगी थी कि वो कुछ अच्छा कर देंगे। देश ने उनमें गांधी जैसा साहस और लाल बहादुर शास्त्री जैसा अटल विश्वास देखा था। संभव है कि वो आज भी कायम है लेकिन उनकी टीम इस विश्वास पर खरी नहीं उतरी। यह तो मानना ही होगा कि अच्छी टीम का चयन करना उनके लिए संभव नहीं था। कुमार विश्वास सहित कई युवा चेहरे अच्छे हैं लेकिन राजनीति के पचड़े से काफी दूर। कई ऐसे लोग भी है जो एनजीओ में काम करते हुए तथाकथित ईमानदार है। शब्दों के चयन में माहिर इन लोगों के भरोसे न तो देश वोट कर सकता है और न राजनीतिक दावपेंच में वो सफल हो सकते हैं। बेहतर होता कि अन्ना अपना आंदोलन जारी रखते। भले ही दस बार ओर उन्हें बिना किसी परिणाम के अनशन से उठना पड़ता। महात्मा गांधी भी तो कई बार बिना निर्णय के ही अनशन से उठे होंगे। जरूरी नहीं था कि सरकार उनके सामने झुकती। जनता ने तो सजदा किया ही था। अन्ना के आंदोलन की तुलना जेपी के आंदोलन से की गई। यहां यह समझने का प्रयास करना होगा कि जेपी के आंदोलन की मियाद कितनी थी। अन्ना की तरह महज सोलह महीने में खत्म नहीं हो गया था या फिर अपना इरादा नहीं बदल दिया था। जेपी के आंदोलन से निकले नेता भी आज साफ नहीं है, उन पर भी दाग है। एक लम्बे संघर्ष के बाद निकले नेता शरद यादव, परिवारवाद के नए चेहरे मुलायम सिंह यादव और चारा किंग लालू प्रसाद यादव ने जेपी की विचारधारा की हवा निकाल दी। नीतिश्ा कुमार कुछ हद तक सफल है लेकिन कोयले की खान में बेदाग वो भी नहीं रह सके। इसी तरह कैसे मान लिया जाए कि राजनीति में आने के बाद अन्ना की टीम के सदस्य भी बेदाग रह पाएंगे। वो भी तब जब उन पर आरोप लगने का सिलसिला पहले ही शुरू हो चुका है।
अन्ना को एक बार फिर विचार करना चाहिए। अभी वक्त बाकी है। पार्टी का गठन नहीं हुआ है। एक समान सत्ता खड़ा करने का तरीका सिर्फ राजनीति में आना नहीं है बल्कि अपने दम पर भीड़ एकत्र करना भी है। अन्ना जंतर मंतर पर उस सामान्य भीड़ को देखकर शायद हताश हो गए लेकिन हकीकत में भ्रष्टाचार के मुद़दे पर पूरा देश उनके साथ है। वोट देने के लिए शायद नहीं। जब लोकसभा चुनाव आएगा तो मेरे शहर के लोग इस लिए वोट नहीं करेंगे कि वो ईमानदार है या बेईमान। वो तो इसलिए मतदान करेंगे कि सामने वाला कौनसी जात का है। इस सत्य से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता। अगर टीम अन्ना भी इसी आधार पर टिकटों का वितरण करते हुए ईमानदार लोगों को सामने लाएगी तो कहा जाएगा कि जातिवाद को स्वीकार कर टीम अन्ना आगे बढ़ी है। किसी भी रास्ते से टीम अन्ना का राजनीति में आना उचित नहीं है। मुझे तो स्तम्भकारों का यह प्रश्न भी सही लगता है कि टीम अन्ना सत्याग्रह कर रही थी या फिर दूराग्रह। अगर यह सत्याग्रह था तो इसका परिणाम यह नहीं होना चाहिए था। अन्ना आपसे देश उम्मीद कर रहा है, प्रधानमंत्री बनने की नहीं, देश को सुधारने की।
Friday, May 18, 2012
नहीं मिल रहा देश का पहला नागरिक
इन दिनों देश में प्रथम नागरिक की तलाश हो रही है। कुछ ही तलाश अमेरिका में भी चल रही है। वहां राष्टपति चुनाव को लेकर जितनी सरगर्मी है, उसका एक फीसदी हिस्सा भी हमारे देश में देखने को नहीं मिल रहा। कारण साफ है कि इसमें छुटभैया से लेकर वरिष्ठतम नेता का खास जुड़ाव नहीं है। नेताओं की फेहरिस्त में शामिल 99 फीसदी नेताओं को इससे कोई सरोकार नहीं है कि अगला राष्टपति कौन बनने वाला है। यह तय है कि उनका नम्बर नहीं आने वाला। बात अगर आजादी के बाद की करें तो राष्टपति पद बहुत ही गरीमामय था। राष्टपति बनने की इच्छा हर बडे़ नेता की होती थी। आज ऐसा लगता है कि प्रमुख नेता इस पद से ही दूर भाग रहे हैं। कारण साफ है कि राष्टपति बनना राजनीति से रिटायरमेंट की तरह है। देशभर में नेता इसीलिए राष्टपति नहीं बनना चाहते। इन दोनों संवैधानिक पदों के प्रति खास रुचि नहीं होना हमारे संविधान की भावनाओं को चुनौती के समान है। अजीब सी उलझन है। कई बार प्रणब दा का नाम आता है तो मन कांपने लगता है। लगता है देश को चलाने वालों में प्रणब दा जैसे ही लोग बचे हैं। उन्हें भी राष्टपति बना दिया तो सरकार का क्या होगा। कैसे चलेगी सरकार। जैसे यह कल्पना करना कठिन था कि इंदिरा गांधी के बिना सरकार कैसे चलेगी, सुनील गावस्कर के बिना टीम इंडिया कैसे खेलेगी। आज भी प्रणब दा और चिदंबरम जैसे नेताओं के बाद सरकार खाली खाली लगती है। फिर ऐसे व्यक्ति की राष्टपति के रूप में खोज शुरू हो रही है जो किसी काम का नहीं हो लेकिन हस्ती बड़ी हो। पार्टियां देश के लिए नहीं बल्कि अपनी राजनीति के आधार पर नेताओं के नाम ले रही है। चिंता तो इस बात की है कि कलाम के नाम पर भी आपत्ति होने लगी है। आपत्तिजनक तो यह भी है कि कलाम का नाम दोबारा आया ही क्यों। क्या हम अपने ही नेताओं में कुछ ऐसे लोगों का चयन करने की स्थिति में ही नहीं है जो राष्टपति बन सके। पिछले कुछ वर्षो के राजनीतिज्ञों में ऐसा कोई नहीं है। कुछ ऐसी ही स्थिति राज्यपाल के चयन में भी होती है। राजस्थान को तो अर्से बाद एक मनोनीत राज्यपाल मिला।
Sunday, October 30, 2011
बचाना होगा टीम अन्ना को

अन्ना हजारे की टीम को लेकर सवाल खडे हो रहे हैं। ऐसे लग रहा है जैसे किसी सरकार के मंत्रियों को घेरने का प्रयास हो रहा है। यह ठीक वैसे ही प्रतीत हो रहा है जैसे विपक्ष सक्रिय हो गया है और एक सरकार को गिराने का प्रयास किया जा रहा है। इस बार पर विपक्ष कोई एक पार्टी नहीं बल्कि सभी राजनीतिक पार्टियां है। भ्रष्टाचार से लड़ने निकले अन्ना हजारे को अब भ्रष्टाचार के साथ इन राजनीतिक पार्टियों से भी लड़ना होगा। अन्ना के अनशन के बाद से अब तक जिस तरह से कांग्रेसी नेताओं ने छोटी बड़ी बातों के लिए टीम अन्ना को घेरने का प्रयास किया है वो खिसयानी बिल्ली खंभा नौचे जैसा है। समझ नहीं आता कि जिस आदमी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है, उसकी टीम पर ही सारे दल सवाल क्यों उठ रहे हैं। पहले केजरीवाल को आयकर का नोटिस और बाद में किरण बेदी पर विमान किराए में बचत करने का आरोप। कांग्रेस आरोप लगा रही है और विपक्षी पार्टियां मौन रहकर इसे समर्थन दे रही है। मानो सभी मिलकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अन्ना और उनकी टीम को किनारे करना चाहते हैं। हरियाणा में कांग्रेस का विरोध टीम अन्ना की गलती नहीं है। देश की आजादी के लिए हर उस माध्यम को अपनाया गया था, जिससे अंग्रेजों की आंख खुले। टीम अन्ना भी वो सब करना चाहती है जिससे कांग्रेस सरकार की नींद उगड़े। देश की आजादी की इस दूसरी लडाई में जब टीम अन्ना ने हरियाणा में विरोध किया तो राजनीतिक पार्टियों को आभास हो गया कि अन्ना की शक्ति क्या है। भले ही वोट पर असर कम पड़ा लेकिन माहौल में कांग्रेस का विरोध शुरू हो गया। भाजपा सरकार में होती तो टीम अन्ना निश्चित रूप से भाजपा का विरोध करती। ऐसे में पार्टी विशेष से नहीं बल्कि सिस्टम से झगड़ा साफ प्रतीत होता है। यह झगड़ा किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए है। टीम अन्ना ने यह निर्णय सही किया उन्हें टूटना नहीं है बल्कि साथ मिलकर लड़ना है। इस समर में कुछ और लोगों को साथ मिलना चाहिए। जो किनारे हो रहे हैं, उन्हें सोचना चाहिए। देश की आजादी से जुड़े तथ्यों को टटोलना चाहिए। आरक्षण की लड़ाई में देशभर में लोगों ने आत्मदाह किया लेकिन अन्ना के आंदोलन में ऐसा कुछ नहीं हुआ। ऐसे आंदोलन को बचाना भी आम आदमी का दायित्व है। अगर टीम अन्ना भ्रष्टाचार कर रही है तो वो भी इसी कानून के दायरे में आएंगे। टीम अन्ना को उन लोगों से अवश्य बचना होगा जो भ्रष्टाचार में डूबे हैं और स्वयं को बचाने के लिए इस अभियान से जुड़ना चाहते हैं। फिलहाल ऐसी कोई शख्सियत टीम अन्ना के कोर ग्रुप में नजर नहीं आती।
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